Tuesday, December 17, 2013

एक लंबी कहानी और विस्थापन पर कुछ दर्ज करने की इच्छा...

...विस्थापन को समझने के लिए अब बहुत दूर जाना नहीं पड़ता है बहुत दूर तो बहुत देर हुई हम चले आए। अब बस रहे आना है। इन आरंभिक पंक्तियों के बीच में कहीं ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ शब्द आना चाहिए, लेकिन हम सचमुच इतनी दूर चले आए हैं कि हमारे दुर्भाग्य की शुरुआत कहां से हुई— अब यह स्पष्ट नहीं है। घर से कार्यालय तक जाना भी एक विस्थापन लगता है। ‘रेजिडेंस ऑन अर्थ’ (पाब्लो नेरूदा) और ‘आउट ऑफ प्लेस’ (एडवर्ड सईद) पढ़ चुकने के बाद भी इस तथ्य से मुक्त नहीं हुआ जा सकता कि विस्थापन अब एक दैनिक दुःख है और अगर रघुवीर सहाय की एक काव्य-पंक्ति का आश्रय लेकर कहें तब कह सकते हैं कि इस दुःख को रोज समझना पड़ता है। मेरे सुदूर की स्थिति यह है कि वह स्थिर रहा और विस्थापित हो गया, मैं गतिवान रहा और...

‘यह तथाकथित अज्ञानपूर्ण अंधेरे युगों की ओर लौटने का प्रयास नहीं है बल्कि यह स्वैच्छिक सरलता, निर्धनता और धीमेपन में सुंदरता देखने का प्रयास है। मैंने इसे अपने आदर्श के रूप में देखा है। मैं खुद इस तक कभी नहीं पहुंच पाऊंगा और इसलिए देश से ऐसी कोई उम्मीद नहीं कर सकता, लेकिन विविधता की हवा में उड़ने, जरूरतों की अनेकता की आधुनिक बदहवास दौड़ में शामिल होने का मुझे कोई आकर्षण नहीं है। वे हमारे अंतस को मार देते हैं। जिस चकराने वाली ऊंचाइयों को पाने का प्रयास मनुष्य की प्रतिभा कर रही है, वह हमें हमारे उस विधाता से दूर ले जाएगी जो चमड़ी को ढंकने वाले नाखून से भी अधिक हमारे करीब है...’
[ ‘हिंद स्वराज’ को समझने की कुंजी बताते हुए मोहनदास करमचंद गांधी ]

रघु राय 

‘तद्भव’ के 28वें अंक में प्रकाशित युवा कहानीकार शिवेंद्र की लंबी कहानी ‘चांदी चोंच मढ़ाएब ए कागा उर्फ चाकलेट फ्रेंड्स’ को पढ़ते हुए बहुत स्वाभाविक रूप से ‘हिंद स्वराज’ की याद आती है। कहानी की एक पात्र कलकतिया चाची को नहीं मालूम बाहर की दुनिया कैसी है— ‘अठवा जइसे भईस की देह में पड़े रहते हैं वैसे ही हम लोग जी रही हैं... बाहरी दुनिया की बस एक पापिन को हम जानती हैं— बैरन रेल को। वह हमारे गांव में बस एक पल को रुकती है और हमारा संसार समेटकर न जाने कहां उगल आती है...।’ रेल की ‘धड़क... धड़... धड़...’ इस कहानी का संगीत है और ‘लोक’ इसका गीत—

‘मोरा रे अंगनमा चनन केर गछिया,
ताहि चढ़ी कुररय काग रे
सोने चोंच मढ़ाय देब बायस
जआं पिया आओत आज रे!’

विद्यापति की इन पंक्तियों से शुरू होने वाली यह लंबी कहानी एक अद्भुत विस्थापन-वृत्तांत है। इसे पढ़कर ऐसा लगता है जैसे संसार की बहुत सारी कहानियों ने इस एक कहानी को संभव किया है। सब कहानियां इस तरह संभव नहीं होतीं। वे अपनी प्रगति के लिए दूर तक नहीं जातीं, जैसे उनके पूर्वज गए थे—

‘पियवा गइलन कलकतवा ए सजनी,
तूरी दिहलन पति-पत्नी-नतवा ए सजनी!
किरिन भीतरे परतवा ए सजनी,
गोड़वा में जूता नइखे, सिरवा पर छतवा ए सजनी!
कइसे चलिहन रहतवा ए सजनी,
सोचत-सोचत बीतत बाटे दिन-रतवा ए सजनी!
कतहूं लागत नइखे पतवा ए सजनी,
लिखत ‘भिखारी’ खोजिकर बही-खतवा ए सजनी!’
 [ भिखारी ठाकुर कृत ‘बिदेसिया’ ]    

हमें चले गए पूर्वजों को खोजना होता है, उनके पद-चिन्हों पर चलते हुए— विस्मृति से बचते हुए। शिवेंद्र का कहानीकार बहुत अध्यवसाय से यह कार्य करता है क्योंकि वह जानता है कि लौटने से बढ़कर और कोई जादू नहीं। और यह भी कि जितने भी वादे थे सब लौटती बेर के थे और उमर खत्म हो रही थी और किसी का भी लौटना हो नहीं रहा था।

यह कहानी हिंदी में एक ऐसे वक्त में नुमायां हुई है, जब कहानियां हमें फरेब दे रही हैं और संसार में कहानियों का वक्त गुजर चुका है, बावजूद इसके कि गई हाल में ही एलिस मुनरो को साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया। यह कहानी बताती है कि सच्चाइयां सबसे लंबे दिनों तक सिर्फ कहानियों में ही जीवित रह सकती हैं। इस कहानी का मुख्य पात्र एक जादूगर है जो जन्म से विस्थापन की त्रासदी झेलने के लिए अभिशप्त है। वह एक ऐसे गांव में पैदा हुआ है जहां के लगभग सारे मर्द कमाने के लिए बाहर गए हुए हैं और लौट नहीं रहे हैं। गांव में एक इंतजारघर है, जहां आकर गांव की सारी स्त्रियां सामूहिक प्रतीक्षा और विलाप करती हैं। इससे ज्यादा इस कहानी को उद्घाटित करना इस कहानी के साथ अन्याय होगा...।

‘अद्भुत’ एक रूढ़ शब्द है और इस कहानी के संदर्भ में अपर्याप्त भी, लेकिन फिर भी इस कहानी के जिक्र में वह यहां आया है। किसी रचना के तात्कालिक प्रभाव से मुक्त होने के लिए, जब उसका आस्वाद शेअर किया जाता है तब संबंधित रचना के संदर्भ में ‘अद्भुत’ एक समीचीन शब्द होता है। इस प्रभाव या कहें दबाव से मुक्त होने के बाद जब मैं शिवेंद्र की कहानी के बारे में पुन: सोचता हूं तो पाता हूं कि असल जादू वहां नहीं है जहां हम अपनी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं के लिए विस्थापित हो जाते हैं, बल्कि वहां है जहां से हम विस्थापित होते हैं। हमारे अभाव, विवशताएं और नादानियां हमें हमारे आस-पास घटता हुआ जादू अनुभव नहीं करने देते और यह दुनिया एक इंतजारघर बन जाती है। इसे विस्थापन और विलाप से राहत देने के लिए चाकलेट की जरूरत पड़ती है। चाकलेट और कुछ नहीं— प्रेम, बंधुत्व, सहअस्तित्व और उम्मीद का एक रूपक है। अलका सरावगी के उपन्यास ‘कलि-कथा वाया बाइपास’ में हैमिल्टन साहब को समझाते हुए रामविलास कहता है— ‘देखिए साहब हमें दुःख भी उन्हीं बातों से होता है जिनसे हमें कभी सुख मिला था। अभाव उन्हीं चीजों का महसूस होता है जिनके प्रति कोई भाव रहा था। आदमी छटपटाता है इन विपरीतों के अंतिम सिरों से मुक्त होने के लिए...।’

शिवेंद्र की कहानी कहती है— ‘सदियों से यही होता आया है कि कहानियां, नदियां और लोग अलग-अलग कारणों से अपनी पैदाइश छोड़कर आगे बढ़ते रहे हैं। यह आगे बढ़ना कभी-कभी उड़ने की आकांक्षा और ऊब की अकुलाहट से संभव होता है, लेकिन अक्सर यह जन्मता है उजड़ने की मजबूरी से...।’

विस्थापन के विषय में ऊपर उद्धृत वाक्यों के बाद इसी कहानी से अंत में कुछ और पंक्तियां भी:

‘जब गांव छूटता है, सबसे पहले नदी याद आती है।’

‘घर मां के बाद दुनिया का सबसे प्यारा शब्द है और मां सभी प्यारे शब्दों की दुनिया है।’

‘जब भी जलना चुप रहना... जो आज जल रहा है वह कल बुझ जाएगा।’

‘मरते हुए आदमी का वक्त उसकी हथेली पर होता है और वह किसी भी वक्त में आ जा सकता है।’

‘चांद पर जाने का कोई वक्त नहीं होता, बस आपके साथ कोई जाने वाला होना चाहिए।’

‘एक समय के बाद हर कोई बूढ़ा हो जाता है।’

‘सभी मांएं झूठ गढ़ती हैं।’

‘मनुष्य की अमरता है कि वह अपनी संतान में स्वयं को बचा लेता है।’

‘जब कोई अन्यमनस्क होता है, दरअसल स्मृतियों में होता है।’

‘रो लेने से भीतर का इंतजार शांत हो जाता है— कुछ देर के लिए ही सही।’

Friday, October 18, 2013

व्यक्त वाक्य और एक अनौसत फिल्म

Leonardo DeCaprio और Ben Kingsley के औसत अभिनय और Martin Scorsese के औसत निर्देशन वाली  Shutter Island एक औसत फिल्म ही है, लेकिन बावजूद इसके यह कुछ विशेष वाक्य रचती है-- दरिंदगी, विक्षिप्तता, विरोध, भय और हिंसा के विषय में और इस तरह यह फिल्म कुछ वाक्यों के माध्यम से अपने औसतपन से एक हद तक मुक्त होती है। प्रस्तुत है इस फिल्म से ऐसे ही कुछ वाक्य....




जब तुम किसी दरिंदे को देखते हो तब तुम्हें उसे रोकना ही चाहिए
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कुछ हद तक विरोध है बचने की भावना
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दरिंदगी है होश में न रहना
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घाव दरिंदगी को जन्म दे सकते है
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सबसे बदतर क्या होता है एक दरिंदे की तरह जीना या एक भले आदमी की तरह मर जाना
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परमेश्वर ने हमें हिंसा दी ताकि हम उसे बरते उसके प्रति आदर स्वरूप
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लोग कहते हैं कि आप पागल है और इस पर आपका विरोध यह साबित करता है कि वे जो कह रहे है वह सच है
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बहुमूल्य बातें ही गलत समझी जाती हैं

Friday, October 11, 2013

लोनली बैचलर की डायरी...






रवि जोशी युवा पत्रकार हैं। मुंबइया सिनेमा पर 'दि संडे पोस्ट' में हर हफ्ते लिखते रहे हैं।  कुछ अखबारों में काम करने के बाद गए एक वर्ष से उत्तराखंड से संबंधित एक वेब साइट के निर्माण में प्रमुख सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं। फिलहाल इस सबसे और दिल्ली से ऊबकर पहाड़ पर चले गए हैं। यह बेहतर है कि यह जाना संन्यास या वैराग्य या ध्यान या आत्म-स्थित होने के लिए नहीं है। यह जन और जीवन को बेहतर ढंग से समझने और इस ओर एकाग्र होने के लिए है। प्रस्तुत डायरी अंशों में ऐसी आहटों के साथ-साथ एक युवा-मन भी है और पीछे रह गईं स्थानीयताओं से मोह-भंग सी स्थिति भी। फिर भी यह स्मृति को प्राप्त हो गए मन का रोजनामचा है जो यह प्रकट करता है कि आगे जीवन है...   





...आज रात 10 बजे गाजियाबाद के एक बड़े मॉल से फिल्‍म देखकर निकला। एक अजीब सी उलझन होने लगी। लगा कुछ छूट रहा है। बहुत तेजी से वापस हो जाने को दिल करने लगा, शायद पिछले दो महीनों में उस छोटे से गांव के अंधेरे की आदत हो गई है मुझे, इसलिए सिनेमाघर के अंधेरे से निकलकर बहुत तेज चमकती हुई स्‍ट्रीट लाइट ने अन्‍कफर्टेबल कर दिया। इस बार दिल्‍ली से अपना सब कुछ लेकर जाने के लिए यहां आया हूं, अब मेरे लिए दिल्‍ली या तो एक रास्‍ता बन जाएगी या बाजार, शायद यहीं इस शहर की फितरत है। यह शहर या तो किसी के लिए बाजार है या फिर रास्‍ता। आदमी यहां सिर्फ मतलब से आता है, यहां सिर्फ मतलब से रहता है और मतलब से ही जीता है। यहां कोई कुछ भी बेमतलब करने की हिमाकत नहीं करता। मैं समझदार नहीं हूं फिर भी इस शहर को अपनी आंखों से देखने की जरूरत की है। इसके उलट वह गांव और वहां की बेमतलब(?) जिंदगी मुझे अपनी तरफ ज्‍यादा खींचती है। आज ही एहसास हुआ कि दिल्‍ली की चमक-धमक और तमाम रौनक के बाद भी यह शहर मुझसे वह रिश्‍ता नहीं बना पाया जो छोटे से पंत गांव ने कुछ ही दिनों में बना लिया। अंधेरा भी कितना खूबसूरत हो सकता है, यह भी आज ही पता चला। इस शहर में तो वैसा अंधेरा देखने के लिए आप तरस जाएंगे, ऐसा अंधेरा कि आप अपनी हथेली को भी न देख पाएं। शायद कई लोग मेरी इस बात से इत्तफाक न रखें, तो मैं कहूंगा कि ये लोग शायद लोगों के दिलों को देखने का हुनर जानते हैं। यहां वैसा अंधेरा लोगों के दिलों में है, और उनके चेहरों पर यह बात इबारत की तरह गुदी हुई दिखाई पड़ती है। भागते हुए लोग परेशान है, मेट्रो पहले की तरह ही बोझा उतारती और चढ़ाती अपने विश्राम स्‍थल में पहुंच जाती है। रात होती है लेकिन अंधेरा नहीं होता, दिन होता है चमकदार रोशनी भी होती है, लेकिन यहां एक दिन में दिखने वाले हजारों हजार चेहरों में से किसी एक में भी वह चमक नहीं दिखती, चेहरे की मुस्‍कुराहट आज मोडिफाइड स्‍माइल बन गई है। माफ कीजिएगा मैं यह सलाह देने की हिमाकत कर रहा हूं कि एक बार गांव जरूर देखिए, गंवार लोगों में और समझदार लोगों से दूर बसी उस पिछड़ी दुनिया में अब भी सच्‍चाई और सुकून यहां की तुलना में बहुत ज्‍यादा है।

मेरा दिल अब यहां नहीं लग रहा, क्षमा...

इस शहर में यह मेरी आखिरी रात है, कल इस समय मैं इसकी सरहद को पार कर दूसरे प्रदेश में प्रवेश कर जाऊंगा।
***
दिन की शुरूआत कपड़े धोने से हुई। दो दिन डायरी लिख नहीं पाया। पहले दिन सफर में था और दूसरे दिन थकान ज्‍यादा थी शायद। दिल्‍ली से लौटकर इस गांव में बहुत अच्‍छा लग रहा है। जिस दिन लौटा उस दिन एक बैचलर के जीवन में खिचड़ी और अंडों का महत्‍व समझ आया। दिन में फटाफट खिचड़ी बनाई और रात को आमलेट और रोटी। आलसियों और थके-हारे कुंवारों के लिए ये देसी चीजें कहीं न कहीं पौष्टिकता के आधार पर मैगी को टक्‍कर देती हैं। मैगी हिट है क्‍योंकि खिचड़ी और आमलेट-रोटी का प्रचार-प्रसार नहीं हुआ है और इसके दो मिनट में बन जाने के दावे को किसी टी.वी. चैनल में नहीं दिखाया गया।

आज दिमाग में थोड़ी से खींचतान थी। कल से सुबह जल्‍दी उठने का प्रयत्‍न करुंगा और सुबह टहलने जाउंगा। उम्‍मीद है कि इतना कर सकूंगा। 
***
बिच्‍छू घांस ने आज पहली बार छुआ और जहां-जहां छुआ तेज सुरसुरी हुई और इस अनुभव को झेल चुके कहते हैं कि यह करंट लगने जैसा एहसास 24 घंटों तक रहेगा। आज पहली बार ही मैंने दही जमाने की कोशिश भी की है, नतीजा कल पता चलेगा। मैं एक्‍साइटेड हूं। आज ऐसी तरोई की सब्‍जी खाई जिसे सिर्फ वही खा सकता था जिसने उसे बनाया हो। बेशक अगर 'शोले' में गब्‍बर की मां होती तो वह भी अपने बेटे को उतना ही प्‍यार करती जितना राखी ने 'करन-अर्जुन' को किया। बस यही सोच मैंने अपनी बनाई हुई तरोई की सब्‍जी खा ली। 
और कुछ नहीं बस कई तरह की तकलीफों के साथ सोने का समय हो गया है।
***
एक दिन में 180 किलोमीटर गाड़ी चलाना, लोगों से मिलना और समझना-समझाना। अब तो न खाना बनाने की हिम्‍मत रह गई है और न खाना खाने की...
दिन शुरू भी जूली (मेरी मोटर साइकिल) के साथ हुआ था और खत्म भी उसी के साथ हुआ। पहली बार जूली को अल्‍मोड़ा की सड़कों में घुमाकर लाया। वह खुश है, लेकिन मैं थक गया हूं...
बाकी सब वैसा ही चल रहा है। एक अच्‍छी बात यह हुई कि हल्‍की सी डांट पड़ी और ऐसी उम्‍मीद जगी कि उत्तराखंड फाइटर्स का काम फिर से शुरू होगा। मेरा थोड़ा काम बेशक बढ़ेगा लेकिन मैं उसको लेकर अभी से उत्‍साहित हूं। पूरा एक साल मैंने उस वेबसाइट पर पूरी जान लगाकर काम किया है।
***
याद है वह खिड़की 

अब उसे बंद रखने का समय भी आ गया है। 

यहां सुबह और शाम ठंडी हवाओं के चलने का सिलसिला शुरू हो गया है।

लोग बताते हैं यहां ठंड बहुत होती है, अलाव भी जलाना पड़ता है। 
रजाई में बैठे रह जाना पड़ता है। 
कुछ करो या न करो पर ठिठुरना पड़ता है। 
मोटे कपड़ों में खुद को छुपाना पड़ता है। 

बहरहाल मैं अब खुश हूं...

इन सर्दियों में पहली बार आसमान में रूई की तरह गिरती हुई बरफ देखूंगा

और उस दिन हाथ में गरम कॉफी के साथ खिड़की को फिर से खोलूंगा...
मेरी खिड़की भी बहुत दिनों बाद शायद खुश होगी...
तुम्‍हारे बिना भी। 
***
मैं हिंदी ही लिखता हूं, अंग्रेजी लिखने और पढ़ने के लिए भी हिंदी में ही सोचता हूं, किसी को आदर देना होता है तो हिंदी में बात करता हूं, किसी पर प्‍यार आता है तो हिंदी में ही प्‍यार जताता हूं... बहुत ज्‍यादा तो नहीं लेकिन हिंदी से ही शुरू होता हूं और हिंदी पर ही खत्‍म होता हूं...
प्‍यार, गुस्‍सा, नफरत और ज्ञान सभी की भाषा हिंदी ही है...
***
पहाड़, अंधेरा, बाइक राइडिंग, ठंडी हवा और जंगली जानवरों का डर... एक साथ इतना बेहतरीन होगा आज महसूस किया, पहली बार यहां रात 10 बजे बाइक चलाई...

यहां खरगोश बहुत दूर तक आपकी गाड़ी के आगे रौशनी के साथ भागते हैं-- ऐसा लगता है वे आपको घर तक साथ छोड़ने के मूड में हैं... यहां आकर जाना है प्रकृति को जितनी पास से देखेंगे उतनी ही दुनिया अपनी दिखेगी... यहां तो पेड़-पौधे और जानवर सब मुझसे बात करते हैं...
***
आज अंधेरे में घूमने का मन हुआ। लाइट आ रही थी, जा रही थी... मैं भी निकल पड़ा। यहां के लोग अंधेरे में सड़क पर जाने के लिए मना करते हैं। क्‍योंकि यहां जंगली जानवरों का खतरा ज्‍यादा होता है, लेकिन फिर भी आज मैं इस चंचल मन को नहीं रोक पाया। अंधेरे से खचाखच भरी सड़क पर चलना ऐसा लगता है जैसे मैं मुंह के बल किसी अंधेरी नदी में डूबता जा रहा हूं। अंधेरे की इस नदी में डूबना मुझे बहुत अच्‍छा लगता है।
अब नींद आ गई, मैं सो रहा हूं।

Wednesday, October 9, 2013

सब कुछ... और वह एक विस्थापित बुकमार्क

यह उसके जीवन में विनोद कुमार शुक्ल की कविता के आगमन से बहुत पूर्व की बात है। वह इस संसार की कई पुस्तकों को पढ़ चुका था, लेकिन विनोद कुमार शुक्ल के काव्य-संसार से अब तक अपरिचित था वह अपनी जड़ों से निर्वासित था. वह वृक्ष से छूटे हरे की तरह था-- एक रोजमर्रा के भटकाव में क्षण-क्षण रौंदा जाता हुआ, वह अपना रंग खो रहा था। वह सूखी लकड़ी के रंग का हो गया था, या कहें वह लकड़ी हो गया था

पुस्तकों में पुनर्वास दूसरों के बहाने उन छूट चुकीं स्थानीयताओं में पुनर्वास था जिनके विषय में वह प्राय: सोचता रहता था और जहां अब लौट सकना संभव नहीं था नई स्थानीयताओं में पुनर्वासित होकर वह अपने वास्तविक पड़ोस को खो रहा था इस तरह पुनर्वास में पड़ोस होते हुए भी अनुपस्थित था वहां आवाजाही नहीं थी सुख-दु:ख थे, लेकिन उनकी पूछताछ नहीं थी वहां सब रोग अकेलेपन से शुरू होते थे और उसके हिस्से की व्यथा देकर उसके अकेलेपन से विदा हो जाते थे व्यथा का आकार चाहे आकाश हो जाए पड़ोस को उसके संदर्भ में दृश्य में नहीं आना था तो नहीं आना था    

वह पुस्तकों में रहने लगा था आस-पास का शोर और आत्महीनताएं और अन्याय और अविवेक उसे कुछ भी अनुभव नहीं होता था वह पुनर्वास की प्रत्यक्ष के साथ कोई संगति स्थापित नहीं कर पा रहा था यह भी कह सकते हैं कि इसमें उसकी कोई रुचि नहीं थी वह एक सुघड़ स्मृतिलोक में स्वप्नवत रहता था हालांकि इसके समानांतर जो मूल यथार्थ था, वह बहुत हिंस्र और भयावह था

पुनर्वास में अपने अध्यवसाय से वह जो स्मृतिलोक रच रहा था उसमें उन छूट चुकीं स्थानीयताओं की कल्पना थी जहां एक ही रोज में कई-कई सूर्योदय और सूर्यास्त थे वह गर्म दोपहरों को अपने तलवों के नीचे अनुभव करता था और यह गर्म एहसास उसके कपड़ों से नमक की तरह लिपटा रहता था उसके सिर पर सतत एक बोझ होता था और आगे हत्या की आशंकाएं यह भयावह के समानांतर भयावह था 

इस समानांतरता में सतत जीते हुए वह एक रोज विनोद कुमार शुक्ल की कविता से परिचित हुआ...

इस मनुष्य होने के अकेलेपन में मनुष्य की प्रजाति की तरह लोग थे...

और...

लोगों तक पहुंचने की कोशिश में                                                                   
दो चार लोगों ने मुझे सबसे अलग किया                                                                    
मुझको सुनसान किया                                                                             
बड़ा नुकसान किया                                                                                 
लोगों की बात करने की कोशिश में 

एकदम चुपचाप किया

इस काव्य-संसार में वह उतरा तो उतरता ही चला गया कुछ तैरा और फिर डूब गया उसने पाया कि वह छूट चुकी स्थानीयताओं को पा चुका है उसका अनुभव अपेक्षा से कुछ अधिक और अनिर्वचनीय पा लेने के भयभीत जैसा था। इस आस्वाद के बाद वह बहुत वक्त तक चुपचाप रहा। बस...

मानुष मैं ही हूं इस एकांत घाटी में                                                                
यहां मैं मनुष्य की आदिम अनुभूति में सांस लेता हूं                                                       
ढूंढ़कर एक पत्थर उठाकर                                                                                
एक पत्थरयुग का पत्थर उठाता हूं                                                                  
कलकल बहती नदी के ठंडे जल को                                                                   
चुल्लू से पीकर पानी का प्राचीन स्वाद पाता हूं                                                           
मैं नदी के किनारे चलते-चलते                                                                   
इतिहास को याद कर भूगोल की एक पगडंडी पाता हूं                                                    
संध्या की पहली तरैया केवल मैं देखता हूं.                                                                   
चारों तरफ प्रकृति और प्रकृति की ध्वनियां हैं                                                            
यदि मैंने कुछ कहा तो अपनी भाषा नहीं कहूंगा                                                                 
मनुष्य ध्वनि कहूंगा.

एक प्रदीर्घ मौन के बाद उसने पाया कि वह पृथ्वी में सहयोग और सहवास का अर्थ पा चुका हैएकांत का अर्थ और एक स्थानीयता में सार्वभौमिक विस्तार पा चुका है कुछ संसार स्पर्श कर बहुत संसार स्पर्श कर लेने की चाह का उसने वरण कर लिया है और अब वह घर और संसार को अलग-अलग नहीं देख पा रहा है उसे यह सृष्टि बहुत संभावनापूर्ण लग रही है, हालांकि हिंसा बहुत है...

ऐसे छोटे बच्चे से लेकर                                                                      
जिनके हाथ सांकल तक नहीं पहुंचते                                                                 
घर का कोई भी दौड़ता है दरवाजा खोलने                                                                     
जिसे सुनाई देती है दरवाजा खटखटाने की आवाज.

थोड़ी देर होती दिखाई देती है तो चारपाई पर लेटे-लेटे                                                       
घर के बूढ़े-बूढ़ी चिंतित हो सबको आवाज देते हैं                                                  
कि दरवाजा खोलने कोई क्यों नहीं जाता?                                                             
पर ऐसा होता है कि दरवाजा खुलते ही                                                           
स्टेनगन लिए हत्यारे घुस आते है                                                                       
और एक-एक को मारकर चले जाते हैं                                                                 
ऐसा बहुत होने लगता है                                                                                 
फिर भी दरवाजे के खटखटाने पर कोई भी दौड़ पड़ता है                                                   
और दरवाजा खटखटाए जाने पर                                                                     
दरवाजे बार-बार खोल दिए जाते हैं

पहाड़ों, जंगलों, पेड़ों, वनस्पतियों, तितलियों, पक्षियों, जीव-जंतु, समुद्र और नक्षत्रों से अपरिचय रखने के बावजूद उसने पाया कि वह धरती को जानता है उसने पाया कि अपरिचित भी आत्मीय हैं। सब आत्मीय हैं और सब जान लिए जाएंगे मनुष्यों से वह मनुष्य को जानता है  

वह विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ चुका था... और इसके बाद वह लगातार नई-नई स्थानीयताओं में पुनर्वासित होता रहा। इन नई स्थानीयताओं से पहले छूट चुकीं स्थानीयताओं को वह दूसरों के बहाने पुस्तकों में पाता था और मूल यथार्थ से कटकर एक सुघड़ स्मृतिलोक में स्वप्नवत रहता था अब वह बदल चुका था अब वह संसार को स्मृतिलोक-सा बनाना चाहता था इसके लिए जो अवयव चाहिए, उन्हें इस संसार से ही पाना चाहता था वह अब पुस्तकों में कम और संसार में ज्यादा रहने लगा था यह दृष्टि विनोद कुमार शुक्ल के काव्य-संसार से गुजरने के बाद आई थी...

बहुत कुछ कर सकते हैं जिंदगी में का काम बहुत था                                                   
कुछ भी नहीं कर सके की फुर्सत पाकर                                       

मैं कमजोर और उदास हुआ                                                   

ऐसी फुर्सत के अकेलेपन में दु:ख हुआ बहुत                                                                     
पत्नी ने कातर होकर पकड़ा मेरा हाथ                                                                        
जैसे मैं अकेला छूट रहा हूं उसे अकेला छोड़                                                                     
बच्चे मुझसे आकर लिपटे अपनी पूरी ताकत से                                                                    
मैंने अपनी ताकत से उनको लिपटाया और जोर से                                                          
पत्नी बच्चों ने मुझे नहीं अकेला छोड़ा                                                                      
फिर भी सड़क पर गुजरते जाते मैं                                                                                 
हर किसी आदमी से अकेला छूट रहा हूं                                                                   
सबसे छूट रहा हूं                                                                                
एक चिड़िया भी सामने से उड़कर जाती है                                                                    
अकेला छूट जाता हूं                      

चूंकि मैं आत्महत्या नहीं कर रहा हूं                                                                        
मैं दुनिया को नहीं छोड़ रहा हूं




अब वह अपने एक प्रतिरूप को पुस्तकों में विस्थापित कर प्रकट और मूल यथार्थ से जूझ रहा थारोज गुजर रहे थे और विनोद कुमार शुक्ल उसकी पाठकीय दिनचर्या की परिधि से छूट चुके थे इस छूटने से मिल पाना वैसे ही गैर मुमकिन था जैसे छूट चुकी स्थानीयताओं से मिल पाना हालांकि पुनर्वास अब कम कष्टदायी था और पड़ोस कम असहनीय लेकिन उसका प्रतिरूप उसके मार्गदर्शन के बगैर आश्रयवंचित था उसने इस प्रतिरूप के कुछ और प्रतिरूप बनाए और उन्हें विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों और अन्य कविता-संग्रहों में अलग-अलग रखकर छोड़ दिया और इस संसार को पढ़ने लगा, यह सोचकर कि विनोद कुमार शुक्ल के इन उपन्यासों और कविता-संग्रहों को वह कभी ‘आदिवास’ में पढ़ेगा यह एक सुंदर कल्पना थी कि यह आदिवास इस संसार से बाहर नहीं होगा। वह आगामी उम्रों में होगा, एक रोज इस संसार में ही संभव होगा... लेकिन वह हर उस जगह से बहुत दूर कर दिया गया जो उसकी अतीव कल्पना में बहुत पवित्रता और विस्तार में थी वह ‘विस्थापन’ की बहुत गर्म सुबहों में बहुत जल्दी उठकर विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों और कविता-संग्रहों को पढ़ता और रात तक एकाकी और उदास रहता था वे प्रेम में ‘नहीं होने’ के दिन थे...
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उसका जीवन एक रोजमर्रा में विनोद कुमार शुक्ल का बहुत ऋणी है वह असंख्य अर्थों में वंचित रहता अगर वह विनोद कुमार शुक्ल के सृजन के समीप न गया होता संभवत: जीवितों के संसार में बहुतों के ऐसे विचार होंगे, लेकिन वह यह तथ्य उजागर करता है-- वे उसे सबसे बढ़कर प्रिय हैं। उसकी कभी उनसे कोई मुलाकातें नहीं रहीं. कभी कोई संवाद नहीं रहा. उसने कभी उन्हें सशरीर नहीं देखा वह बस उस ‘सृजन’ का साक्षी रहा है, जहां वह एक ‘बुकमार्क’ बनकर वर्षों से रह रहा है... 

[प्रस्तुत टिप्पणी 'पाखी' के विनोद कुमार शुक्ल पर एकाग्र अंक में प्रकाशित है और इसमें प्रयुक्त समग्र काव्य-पंक्तियां विनोद कुमार शुक्ल के तीसरे कविता-संग्रह ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ (1992, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) से ली गई हैं]

Wednesday, August 14, 2013

आगाज : मैंने कहा आजादी…


...मैंने सोचा और संस्कार के वर्जित इलाकों में
अपनी आदतों का शिकार होने के पहले ही बाहर चला आया
बाहर हवा थी धूप थी घास थी
मैंने कहा आजादी
मुझे अच्छी तरह याद है मैंने यही कहा था
मेरी नस-नस में बिजली दौड़ रही थी
उत्साह में खुद मेरा स्वर मुझे अजनबी लग रहा था
मैंने कहा- आ जा दी...
मैं सोचता रहा और घूमता रहा टूटे हुए पुलों के नीचे
वीरान सड़कों पर आंखों के अंधे रेगिस्तानों में
फटे हुए पालों की अधूरी जल-यात्राओं में
टूटी हुई चीजों के ढेर में
मैं खोई हुई आजादी का अर्थ ढूंढ़ता रहा
अपनी पसलियों के नीचे अस्पतालों के बिस्तरों में                                                                                         

नुमाइशों में बाजारों में गांवों में जंगलों में पहाडों पर                                          
देश के इस छोर से उस छोर तक
उसी लोक-चेतना को बार-बार टेरता रहा जो मुझे दोबारा जी सके
जो मुझे शांति दे और मेरे भीतर-बाहर का जहर खुद पी सके

मैंने महसूस किया कि मैं वक्त के एक शर्मनाक दौर से गुजर रहा हूं 
अब ऐसा वक्त आ गया है जब कोई
किसी का झुलसा हुआ चेहरा नहीं देखता है
अब न तो कोई किसी का खाली पेट देखता है न थरथराती हुई टांगें                               
और न ढला हुआ ‘सूर्यहीन कंधादेखता है
हर आदमी सिर्फ अपना धंधा देखता है

वे जिसकी पीठ ठोंकते हैं
उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है
वे मुस्कराते हैं और दूसरे की आंख में 
झपटती हुई प्रतिहिंसा करवट बदलकर सो जाती है
मैं देखता रहा… देखता रहा
हर तरफ ऊब थी संशय था नफरत थी
लेकिन हर आदमी अपनी जरूरतों के आगे असहाय था                                                                                

उसमें सारी चीजों को नए सिरे से बदलने की बेचैनी थी रोष था
लेकिन उसका गुस्सा
एक तथ्यहीन मिश्रण था आग और आंसू और हाय का
इस तरह एक दिन जब मैं घूमते-घूमते थक चुका था
मेरे खून में एक काली आंधी दौड़ लगा रही थी
मेरी असफलताओं में सोए हुए वहसी इरादों को झकझोरकर जगा रही थी...


धूमिल की एक लंबी कविता  'पटकथा'से कुछ अंश  
चित्राकृति  : अर्पणा कौर