द र अ स ल

Wednesday, April 6, 2016

बगैर इनवर्टेड कॉमा और ब्रैकेट वाली एक महान रिपोर्टिंग

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मेरे अजीज उपन्यासकार कृष्ण बलदेव वैद अपनी डायरी में फरमाते हैं :   मंच पर बैठे हुए वक्ता मुझे बूढ़ी वेश्याओं से दिखाई देते हैं —   खा...
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Friday, January 1, 2016

2015 की पंद्रह किताबें

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जैसे सब वर्ष अंतत: गुजर जाते हैं वैसे ही वर्ष 2015 भी गुजर गया। संसार में गुजर जाना एक शाश्वत क्रिया है, लेकिन इस गुजर जाने को ए...
Friday, August 21, 2015

युवा कविता : एक अपील

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इतिहासबोध के लिए एक क्रमभंग   अच्युतानंद मिश्र * मित्रो, ...गए दिनों हिंदी में युवा कविता को लेकर एक बहस की स्थिति ब...
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Saturday, June 20, 2015

‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ पर पंकज चतुर्वेदी की एक कविता

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आइए   समलैंगिकता एक प्यार है इंसान का इंसान से ज़रूरी नहीं लैंगिकता का ख़याल रखकर किया जाए एक समाचार चैनल पर समलैंगिकत...
Sunday, June 7, 2015

कि जैसे मुझे इसका भी पता था

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इस मंच पर विराजमान ये सभी लोग खोए हुए लोग हैं इनके नाम के बातस्वीर इश्तिहार भी शायद निकले हुए हों जो मनुष्य अभ...
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