Friday, January 1, 2016

2015 की पंद्रह किताबें



जैसे सब वर्ष अंतत: गुजर जाते हैं वैसे ही वर्ष 2015 भी गुजर गया। संसार में गुजर जाना एक शाश्वत क्रिया है, लेकिन इस गुजर जाने को एक विश्लेषक दृष्टि से देखना प्राय: समय की मांग है। गुजरे हुए की पड़ताल में जरूरी नहीं कि यह सदिच्छा सब बार निहित ही हो कि आगे उन गलतियों के दोहराव से बचा जाए जो हो चुकी हैं, और यह भी कि भविष्य में उस सकारात्मकता और सजगता से ऊर्जा पाई जाए जो गुजरे हुए में थी ...और यह करके स्वप्नों और उम्मीदों के नए रास्ते खोले जाएं। यह बात वैसे तो सभी कार्य-क्षेत्रों पर लागू होती है, लेकिन अगर केवल हिंदी साहित्य तक ही इस कथ्य को सीमित करें, तब बेशक यह कहा जा सकता है कि यह अब भी संभावना है।
 

कुछ बेहतर किताबों, पुरस्कार-चर्चाओं, पुरस्कार-वापसी और अन्य लोकप्रिय विवादों से सार्थक, जीवंत और गर्म रहा यह साल जाते-जाते पूरे हिंदी-जगत को शोकाकुल कर गया। तीन महत्वपूर्ण कवि इस वर्ष के अंतिम चार महीनों में दिवंगत हुए — सितंबर में वीरेन डंगवाल और दिसंबर के शुरू में रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ और दिसंबर के अंत में पंकज सिंह इस जहां को गुडबाय कह गए।

इस दुःख और क्षति के साथ देखें तो इन दिनों हिंदी साहित्य बड़ी अजीब बहसों से गुजर रहा है। जहां तक नजर जाती है शब्द ही शब्द हैं और लेखक होना इतना आसान है कि महज कुछ हजार रुपए खर्च कर कोई भी लेखक बन सकता है। लोकप्रिय उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक ने एक बातचीत में कहा कि जो लिखता है, वह लेखक होता है। इसी बातचीत में आगे उन्होंने अपने लिखने को अपना व्यापार बताया। हिंदी में लेखक होना इतना खुदगर्ज, इतना मूल्यहीन और इतना चालू कभी नहीं था, जितना आज है।

कथाकार अनिल यादव ने गए साल कहा था : ‘‘न इज्जत है, न रॉयल्टी है, न ग्लैमर है फिर भी हिंदी में कविता, कहानी का हैजा है। लेखक कहलाने, भीड़ में पहचाने जाने से लेकर अमर होने तक की आकांक्षाओं के चलते बड़ी मात्रा में किताबें आ रही हैं। ऐसी किताबें छापना-छपवाना असल में अधकचरे अरमानों की प्रोसेसिंग है। एक तरह से ये छपने-दिखने के अवसरों का दुरुपयोग भी है।’’

इस दृश्य में 2015 से पंद्रह उल्लेखनीय किताबें चुनना एक सुविधाजनक रास्ता लग सकता है
लेकिन असल में यह बेहद असुविधाजनक है, क्योंकि कथा-कविता से इतर प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी हिंदी में कुछ उल्लेखनीय नजर नहीं आ रहा। इसकी भरपाई के लिए इस कथ्य में ‘पुनश्च’ के अंतर्गत इस वर्ष की पंद्रह ऐसी उल्लेखनीय रचनाएं जोड़ने की कोशिश की गई है, जो पत्र-पत्रिकाओं या ब्लॉग्स में प्रकाशित हुईं। फिर भी यहां यह जोड़ना जरूरी है कि यह चयन-दृष्टि व्यक्तिगत रुचियों और सीमाओं का मामला-भर है, कोई अंतिम राय या निर्णय नहीं। 
 
जयशंकर प्रसाद की एक कविता-पंक्ति है कि ‘‘छलना थी लेकिन उसमें मेरा विश्वास घना था’’ ...इस तर्ज पर कहें तो कह सकते हैं कि इस वर्ष भी हिंदी में कविता के नाम पर व्यापक छलावा हुआ। बहुत सारे कवितावंचित कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। उन सबके नाम जानने के लिए ‘दैनिक जागरण’ में प्रकाशित ओम निश्चल का सर्वेक्षणालेख ‘औसत का राज्याभिषेक’ पढ़ा जाना चाहिए। लेकिन औसत की भीड़ में अगर कविता चाहिए तो इस वर्ष प्रकाशित इन चार कविता-संग्रहों को पढ़ना जरूरी है :

कविता
 
कुमारजीव (कुंवर नारायण)
जिद (राजेश जोशी)
रक्तचाप और अन्य कविताएं (पंकज चतुर्वेदी)
लुका-झांकी (दर्पण साह)
*

पुन: एक कविता-पंक्ति के आश्रय से ही बात करें तो गजानन माधव मुक्तिबोध की एक कविता-पंक्ति है कि ‘‘दुनिया में नाम कमाने के लिए कोई फूल नहीं खिलता है’’ ...लेकिन हिंदी में यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ कवि नाम कमाने के लिए कहानियां लिखने लगते हैं। इस प्रकार के कहानीकारों से परहेज करते हुए यह पाया जा सकता है कि लोदी रोड से लेकर दरियागंज तक दौड़ने के बावजूद इस वर्ष के हिंदी के चार महत्वपूर्ण कहानी-संग्रह तक हाथ नहीं लगते। स्वयं प्रकाश के ‘छोटू उस्ताद’ को पढ़कर निराशा हाथ लगती है। अंत में दो ठीक-ठाक कहानी-संग्रह ही नजर आते हैं :
 
कहानी
 
जलमुर्गियों का शिकार (दूधनाथ सिंह)
हलंत (हृषिकेश सुलभ)
*
 
मलयज की एक कविता-पंक्ति है कि ‘‘व्यर्थता अर्थ का वह कुंवारापन है जिसे भोगा नहीं गया’’ ...इस पंक्ति के प्रकाश में देखें तब देख सकते हैं कि उपन्यासों के अगर अंश छप जाए तो उनके बारे में एक राय कायम की जा सकती है, जैसे अब तक अप्रकाशित गीत चतुर्वेदी और अनिल यादव के उपन्यासों के बारे में क्रमश: अच्छी और बुरी राय कायम हो चुकी है। लेकिन अगर अंश सामने नहीं आएं तो बहुत सारे उपन्यासों को उठाकर पछताने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं होता। अलका सरावगी का उपन्यास ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’ अपनी रायटिंग नहीं मार्केटिंग की वजह से इस वर्ष चर्चा में रहा, लेखिका ने लगभग इसे आवाज लगा-लगाकर, दरवाजे खटखटा-खटखटाकर बेचा। इसलिए इस उपन्यास को इसकी लेखिका के भरोसे ही छोड़कर इस वर्ष आए दो अन्य उपन्यासों को इस सूची में दर्ज करना चाहिए :

उपन्यास
 

पहाड़ (निलय उपाध्याय)
बनारस टॉकीज (सत्य व्यास)
*
 

पुन: एक कविता-पंक्ति के आश्रय से ही बात करें तो अज्ञेय की एक कविता-पंक्ति है कि ‘‘जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है’’ ...हिंदी में सारा समीक्षात्मक-समालोचनात्मक कर्म इस पंक्ति के ही आदर्श वैभव में गर्क है। समीक्षाएं संबंधों की मारी हैं और समालोचना सर्वथा अपाठ्य है। हिंदी में आलोचना की हालत वही है जो टी.वी. सीरियल्स में एक्टिंग की है — करनी किसी को नहीं आती, लेकिन कर सब रहे हैं। बमुश्किल इस वर्ष प्रकाशित आलोचना की दो किताबें ही उल्लेखनीय नजर आती हैं :  

आलोचना
 

जीने का उदात्त आशय (पंकज चतुर्वेदी) 
हिंदी आलोचना में कैनन-निर्माण की प्रक्रिया (मृत्युंजय)
*

कविता-पंक्तियां यहां बहुत हो रही हैं, लेकिन इसे एक कविता-विरोधी समय में कविता के पुनर्वास के रूप में लिया जाना चाहिए... तो शमशेर बहादुर सिंह की एक कविता-पंक्ति है कि ‘सूर्य मेरी अस्थियों के मौन में डूबा’ ...हिंदी में ‘आत्मकथा की संस्कृति’ भी रही है और इस पर पंकज चतुर्वेदी ने शोध-कार्य भी किया है। लेकिन यह संस्कृति प्रतिवर्ष पल्लवित नहीं होती। हिंदी में आत्मकथाएं अभावग्रस्तता के शिल्प में संदिग्ध और हास्यास्पद होने को अभिशप्त हैं। लिहाजा इस क्रम में इस प्रकार की एक आत्मकथा को चुनना पड़ रहा
है जिसके चयन की पीछे अभावग्रस्तता का शिल्प बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। यह आत्मकथा संदिग्ध और हास्यास्पद दोनों ही है, लेकिन कैसे इसके लिए इसे पढ़ना ही होगा : 

आत्मकथा
 

जमाने में हम (निर्मला जैन)
*

रघुवीर सहाय की एक कविता-पंक्ति है कि ‘इस दुःख को रोज समझना क्यों पड़ता है’ ...डायरी अपने दुःख को रोज समझने का रास्ता है। अनु सिंह चौधरी की ‘मम्मा की डायरी’ को बेहतर मानते हुए भी इस क्रम से बाहर रखना पड़ रहा है, क्योंकि निदा नवाज की डायरी अपने बयानों से ज्यादा बेचैन करती है। अपने छात्रों पर लिखे गुरु विश्वनाथ त्रिपाठी के संस्मरण अपने गद्य की वजह से ग्राह्य हैं। प्रभात रंजन की ‘कोठागोई’ को किस विधा में रखा जाए, यह एक संकट है। इस संकट को एक खासियत की तरह भी झेला जा सकता है। इस वर्ष की यह सबसे चर्चित और पठनीय हिंदी कृति है। कृष्ण कल्पित विरचित ‘कविता-रहस्य’ के आगे ...उर्फ नया काव्य-शास्त्र भी जुड़ा हुआ है। आगामी कवियों को समर्पित यह कृति अगर शास्त्र न भी मानी जाए तब भी इसे कविता के बारे में एक सुदीर्घ कविता मानकर पढ़ा जा सकता है : 

डायरी/ संस्मरण/ विविध
 

सिसकियां लेता स्वर्ग (निदा नवाज)
गुरुजी की खेती-बारी (विश्वनाथ त्रिपाठी)
कोठागोई (प्रभात रंजन)
कविता-रहस्य (कृष्ण कल्पित)
* 

पुनश्च :

1)  प्रकृति करगेती की कहानी ‘ठहरे हुए लोग’ (हंस, जनवरी-2015)

2)  प्रियंवद की सलवटें ‘मेरी इच्छाएं मेरा तर्क हैं’ (पाखी, अप्रैल-2015)

3)  आशुतोष भारद्वाज की डायरी (http://sidmoh.blogspot.in, 6 अप्रैल 2015)

4)  योगेंद्र आहूजा से संवाद ‘सारी मानवीयता दांव पर लगी है’ (पाखी, मई-2015)

5)  भालचंद्र जोशी की कहानी ‘आने वाले कल का खूनी सफर’ (कथादेश, जून-2015)

6)   कपिला वात्स्यायन का आलेख ‘भारतीय कला : समग्रता की खोज’ (नया ज्ञानोदय, जून-2015)

7)  भगवान सिंह की कृति ‘कोसंबी : कल्पना से यथार्थ तक’ पर सियाराम शर्मा का आलेख ‘तुम्हीं कहो यह अंदाजे-गुफ्तगू क्या है’ (अकार-41)

8)  विश्वनाथ त्रिपाठी का आलेख ‘आंखें वे देखी हैं जबसे’ (तद्भव-30)

9)  योगेंद्र आहूजा की कहानी ‘मनाना’ (पहल-100)

10)  देवी प्रसाद मिश्र की कविताएं (पहल-100)

11)  शिवेंद्र की कहानी ‘कहनी’ (पल प्रतिपल-78)

12) अनिल यादव की कहानी ‘दंगा भेजियो मौला’ पर संजीव कुमार का आलेख ‘दंगे में आएंगे’ (हंस, सितंबर-2015)

13)  रश्मि भारद्वाज की कविताएं (सदानीरा-9)

14)  वीरेन डंगवाल की एक कविता ‘रामपुर बाग की प्रेम-कहानी’ के बहाने आशुतोष कुमार (जलसा-4)
 
15)  शुभम श्री की डायरी (जलसा-4)

***
'दि संडे पोस्ट'' में प्रकाशित 
तस्वीर : अनुराग वत्स

Friday, August 21, 2015

युवा कविता : एक अपील




इतिहासबोध के लिए एक क्रमभंग 
अच्युतानंद मिश्र
*

मित्रो,

...गए दिनों हिंदी में युवा कविता को लेकर एक बहस की स्थिति बनीयह बहस किसी सार्थक संवाद में नहीं बदल सकी तो उसके कुछ निश्चित कारण थेसवाल युवा कविता के भीतर से भी उठाए गए और बाहर से भीकुछ बातें बहुत प्रायोजित और सुनिश्चित योजना के तहत कही गईं कुछ टिप्पणियों का मंतव्य युवा कविता को सिरे से खारिज करना था तो कुछ इस बात पर सहमत थे कि हिंदी में किसी भी पहले समय की अपेक्षा अधिक अच्छी कविताएं लिखी जा रही हैंयह बेहतर ही होता कि हम उन कारणों पर कुछ गंभीरता से विचार करतेएक तरह से युवा कविता के इस वर्तमान परिदृश्य को लेकर एक कंफ्यूजन की-सी स्थिति बरकरार है 

यह तो हम सब स्वीकार करेंगे ही कि हिंदी कविता अपने सबसे गहन संकट के दौर में हैइस संकट का स्वीकारबोध अगर हमारे वरिष्ठ कवियों में नहीं है तो इसके लिए युवा कवि जिम्मेदार नहीं हो सकतेवर्तमान कविता के परिदृश्य को अगर हमारे वरिष्ठ कवियों ने राजनीति के पीछे चलने वाली खबर की तरह बना दिया है तो हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि यह हमें विरासत में मिला है इस विरासत का हमें क्या करना है, यह भी हमें ही सुनिश्चित करना होगा

यहां युवा कविता से मेरी मुराद उन कवियों से है जिन्होंने नई सदी में लिखना आरंभ किया

हिंदी के युवा कवियों को एक दोहरे संकट से गुजरना पड़ रहा हैवे कविता में जिन प्रवृत्तियों का विरोध कर रहे हैं, जीवन जीने की प्रक्रिया में वही प्रवृत्तियां उन पर बलात थोपी जा रही हैं समूचा साहित्यिक परिदृश्य एक सांस्थानिक उपक्रम में बदल चुका हैपुरस्कारों की राजनीति से शुरू होकर नौकरी पाने तक की प्रक्रिया एक विशाल दलदल का रूप ले चुकी हैयुवा कविता इसी दमघोंटू परिदृश्य में विकसित हो रही है विरोध के कई स्तर निर्मित हो चुके हैं और हर स्तर का अपना व्यक्तिगत तर्क है

नई सदी की युवा कविता के विषय में यह कहा जा रहा है कि वह विषयाक्रांत हुई है कुछ वरिष्ठ कवियों को ऐसा अगर लगता है तो क्या उन्होंने समय रहते इसकी पड़ताल करने की जरूरत समझीहिंदी की युवा कविता के विषय में इस तरह की मुद्रा और आक्रामकता भरे तेवर दरअसल इस बात की तस्दीक करते हैं कि युवा कविता से जिनका संबंध कभी कभार का होता है, वे कविता के समयबोध को पहचानने में किस तरह चूक जाते हैंवे फूल-पत्ती एवं समयबोध से मुक्त कविता को ही कविता का मूल विषय मानने लगते हैं वे युवाओं से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे इसे स्वीकार करें 

बूढ़ा गिद्ध पंख क्यों फैलाए पूछने वाले अब खुद पंख फैला रहे हैंयुवा कविता को संरक्षण देने का यह नायाब तरीका उन्होंने ढूंढ़ निकाला है

हम इसे उपयुक्त नहीं मानते बल्कि हम यह चाहते हैं कि इस नए समय की गंभीर व्याख्या हो और मौजूदा संकट को उसकी मूल संरचना से पकड़ा जाए इस संदर्भ में हमारा स्पष्ट मानना है कि हमारा समय एक नई गति को रच रहा है आठवें दशक के कवियों ने यह कहां सोचा होगा कि उनके उत्तरकाल में कविताओं के पाठक उन्हें यू ट्यूब  पर देख-सुन सकेंगेअगर रूप बदलेगा तो विषय भी बदलेंगे और विषयों के प्रकट होने की गति भी स्पष्ट है उससे सही तालमेल नहीं बना सकने की स्थिति में यह गति-स्थिति हमें विषयाक्रांत ही नजर आएगी

समूची दुनिया में बड़े पैमाने पर कला रूपों में परिवर्तन हो रहा हैहमारी संवेदना का आयाम अधिक विस्तृत हुआ हैज्ञान के संवेदनात्मक रूपांतरण की मुक्तिबोधीय परिकल्पना में उस रूपांतरण की गति का प्रश्न भी जुड़ गया है हर क्षण हर पल हमारे मस्तिष्क पर जितने तरह के हमले हो रहे हैं, उसने शांत मस्तिष्क की मानवीय परिकल्पना को ही उलट दिया हैपहले के कवि के पास गांव से शहर तक आने के वृहद् अनुभव थेउसमें एक खास तरह का रोमान भी मौजूद होता था इक्कीसवीं सदी में विस्थापन का समूचा मनोविज्ञान बदल गया मध्यवर्गीय परिवार की समूची परिकल्पना बदल गई ऐसे में स्मृतियों में मौजूद संबंध और वास्तव के संबंधों के बीच की दूरी अधिक गहरी हुई है और कवि के अनुभव अधिक कटु आज के युवा कवि के पास दो ही रास्ते नजर आते हैं, या तो वह अपने समय की बेचैनी को उसकी मूल गति के साथ पकड़ने का प्रयत्न करे या मार्मिकता के नए क्षितिजों के विस्तार से संवेदना के नए आयाम रचे 

कई बार परंपरा से आलोचनात्मक संवाद भी यथार्थ की नई मंजिलें तय करता हैइतिहास भले क्रमिकता में जीवित रहता हो, इतिहासबोध के लिए क्रमभंग एक अनिवार्य शर्त होती है

आज की युवा कविता का यह बदला हुआ परिदृश्य एक व्यापक संवाद की मांग करता है, इसलिए कि वह एक संक्रमण काल से गुजर रही हैपुरानी कविता को सिर्फ इसलिए दुहराना ठीक नहीं होगा कि वह एक धीमी गति की दुनिया को रेखांकित करती थीअगर कविता किसी पुरानी मीनार से देखने पर विषयाक्रांत दिखती है तो दिखे युवा कविता की तो सीधी मुठभेड़ अपने समय से है उस समय से जिसे महज राजनीतिक संकल्पना बनाकर कविता को उसके पीछे दौड़ने वाले घोड़े में बदला जाना उसे स्वीकार नहींसिर्फ राजनीतिक घटनाक्रम ही हमारी चेतना को प्रभावित नहीं कर रहे हैं, सामाजिक-सांस्कृतिक रूपाकारों में आए परिवर्तन भी हमें बदल रहे हैं

हमने जब आंखें खोलीं तो सिर्फ बाबरी मस्जिद का विध्वंस या रूस के विघटन की चीख ही नहीं सुनी बल्कि हमें कम्प्यूटर युग और सूचना क्रांति के परिणामों से भी बावस्ता होना पड़ा हमारे मस्तिष्क के समक्ष इस कृत्रिम मस्तिष्क को पैदा कर, हमें किस किस्म के विलगाव में रख दिया गया है, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए

इन तमाम बातों के आलोक में मेरा मानना है कि युवा कविता को लेकर एक सार्थक बहस और रचनात्मक संवाद की दरकार हैनब्बे के दशक के कवियों ने अपने से पहले के कवियों के साथ कोई आलोचनात्मक संबंध विकसित नहीं किया ऐसे में पिछले पच्चीस साल की कविता एक क्रमिक विस्तार का रूप लेती गई नई सदी में अगर यह क्रम टूटता है तो इस टूटन को ही, सही परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किए जाने की जरूरत है 

युवा कविता की यह कोशिश अपने अस्तित्व की पहचान की कोशिश है इसमें उसका समयबोध भी शामिल है
*** 

एक युवा कवि की यह अपील एक नई ऊर्जा वाले कर्म का प्रारंभ है। यह प्रारंभ तमाम गलतबयानियों, आलस्य और दुरभिसधियों को समझने में सहायक है। एक व्यापक अर्थ में इसमें एक ऐसा कर्तव्य, विवेक और समयबोध उपस्थित है जो हमें खंडित होने से बचा लेने को तत्पर है। यह समय हिंदी के युवा कवियों के लिए अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने का नहीं बल्कि उसे मूर्त करने का है। उम्मीद है कि यह अपील इस मायने में दूर तलक जाएगी...

Saturday, June 20, 2015

‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ पर पंकज चतुर्वेदी की एक कविता


आइए 

समलैंगिकता एक प्यार है
इंसान का इंसान से
ज़रूरी नहीं लैंगिकता का
ख़याल रखकर किया जाए

एक समाचार चैनल पर
समलैंगिकता पर बहस में
बाबा रामदेव ने कहा :
यह भारतीय संस्कृति के खि़लाफ़ है
अप्राकृतिक है
मानसिक विकृति है
और अगर सुप्रीम कोर्ट, सरकार और लोग
यह नहीं समझते
तो वे भी भारतीय संस्कृति के खि़लाफ़ हैं

समलैंगिकों के प्रवक्ता का कहना था
कि दुनिया के मशहूर मनोवैज्ञानिकों की राय है
कि समलैंगिक सम्बन्ध
दिमाग़ी ख़राबी नहीं
बल्कि इंसान की
ख़ास आंतरिक बनावट का नतीजा हैं

एक और समलैंगिक ने
एक पत्रिका में अपने इंटरव्यू में पूछा
कि खजुराहो, दहोद और मोधरा की मूर्तियों में
और हमारे प्राचीन ग्रंथ ‘कामसूत्र’ में
समलैंगिकता के रहे होने के सुबूत मिलते हैं
फिर कैसे इसे कुछ लोग
पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित परिघटना बताते हैं

बहरहाल, चैनल पर बाबा रामदेव ने
आगे कहा :
समलैंगिकता की व्याधि से
छुटकारे का उपाय है
प्राणायाम

समलैंगिकों के पैरवीकार ने
अपने तर्कों से
बाबा को मुत्मइन करने की
काफ़ी चेष्टा की
पर अंत में खीजकर कहा :
क्या प्राणायाम, प्राणायाम
प्राणायाम से कुछ नहीं होता है

मगर बाबा इस बात पर अड़े रहे
कि प्राणायाम से
सब ठीक हो सकता है

आइए रामदेव जी !
बावजूद इसके कि वे लोग प्राणायाम जानते हैं
प्राणायाम के राजपथ पर
भारतीय संस्कृति की
छतरी के नीचे
उन्हें धकियाते हुए चलें !
***
साभार : कवि के सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह ‘रक्तचाप और अन्य कविताएं’ से 

Sunday, June 7, 2015

कि जैसे मुझे इसका भी पता था



इस मंच पर विराजमान ये सभी लोग
खोए हुए लोग हैं

इनके नाम के बातस्वीर इश्तिहार भी
शायद निकले हुए हों

जो मनुष्य अभी अध्यक्षता कर रहा है
सबसे ज्यादा खोया हुआ पुरुष है

उसका सब कुछ उससे खो गया है

वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी की यह कविता मैं नामवर सिंह को जब जब मंच पर देखता हूं, याद आती है। हालांकि शनिवार 6 जून 2015 की शाम साहित्य अकादेमी सभागार, नई दिल्ली में नामवर अध्यक्ष नहीं, ‘विशिष्ट उपस्थिति’ थे। लेकिन उनका सब कुछ अब उनसे खो गया है, इसकी सूचना वह अपनी प्रत्येक उपस्थिति में दर्ज करवा ही देते हैं। इस बार प्रसंग था ‘आलोचना’ के दो अंकों (53-54) के प्रकाशन के उपलक्ष्य में ‘भारतीय जनतंत्र का जायजा’ विषय पर केंद्रित परिचर्चा। वक्ताओं में गोपाल गुरु का भी नाम था, लेकिन वह क्यों नामौजूद रहे इसकी कोई जानकारी इस कार्यक्रम के दरमियान नहीं दी गई। आज से करीब दो माह पूर्व इसी सभागार में बीसवें देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह का संचालन करते हुए अशोक वाजपेयी ने साहसिकता को व्यर्थ बताते हुए कहा था कि आजकल कहीं बुलाए जाने पर न आने के कारण बहुत हो गए हैं, ब्लड प्रेशर भी उनमें से एक है। अशोक वाजपेयी नाम का व्यक्तित्व जब बोलता है या जब ‘कभी-कभार’ लिखता है तो लगता है बहुत जूस पीकर बोल रहा है या बहुत बादाम खाकर लिख रहा है। उसके लिखे या बोले में उसके मौजूदा समय का कोई संकट और बेचैनी नहीं होती, या ‘आलोचना’ के नए संपादक अपूर्वानंद के शब्दों में कहें तो कह सकते हैं कि ‘भारतीय जनतंत्र का जायजा’ नहीं होता। वर्ना क्या वजह रही इस कार्यक्रम का संचालन अशोक वाजपेयी ने नहीं लघुप्रेमकथाकार रवीश कुमार ने किया। इस तरह देखें तो... या न भी देखें तो क्या फर्क पड़ता है...

सभागार दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं-शोधकर्ताओं और प्राध्यापकों से खचाखच भरा था, मुहावरे में कहें तो तिल रखने की भी...

अपूर्वानंद ने कार्यक्रम की शुरुआत ‘आलोचना’ के परिचय से और यह कहते हुए की कि जो जितना ही नौजवान है, वह उतना ही फर्श पर बैठे। विनोद तिवारी को बैठने को सीट नहीं मिल रही थी और उधर अपूर्वानंद बता रहे थे कि कैसे गए दिनों में दुनिया भर में ब्लॉगर्स की हत्याएं हुई हैं। उन्होंने यह भी कहा, ‘‘कुछ लोगों को इस पर आपत्ति हो सकती है कि क्यों एक साहित्यिक आलोचना की पत्रिका समाज वैज्ञानिक विषय पर अपने अंक केंद्रित करे, लेकिन ‘आलोचना’ की दिलचस्पी बतौर पत्रिका राजनीति में हमेशा से रही है।’’ ‘आलोचना’ की दिलचस्पी बतौर पत्रिका नामवर सिंह में भी हमेशा से...

लेकिन ‘आलोचना’ की दिलचस्पी अब कविता में क्यों नहीं है... इस प्रश्न के उत्तर के लिए मुझे एक बार पुन: असद ज़ैदी को याद करना होगा :

एक कविता जो पहले ही से खराब थी
होती जा रही है अब और खराब

कोई इंसानी कोशिश उसे सुधार नहीं सकती
मेहनत से और बिगाड़ होता है पैदा
वह संगीन से संगीनतर होती जाती
एक स्थायी दुर्घटना है
सारी रचनाओं को उसकी बगल से
लंबा चक्कर काटकर गुजरना पड़ता है

मैं क्या करूं उस शिथिल
सीसे-सी भारी काया का
जिसके आगे प्रकाशित कविताएं महज तितलियां हैं और
सारी समालोचना राख

मनुष्यों में वह सिर्फ मुझे पहचानती है
और मैं भी मनुष्य जब तक हूं तब तक हूं

फिलहाल ‘प्राइम टाइम’ शुरू हुआएंकर : रवीश कुमार और उनके साथ थे आदित्य निगम, राजनीतिशास्त्री (सीएसडीएस), अनुपमा रॉय, राजनीतिशास्त्री (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय), हिलाल अहमद, राजनीतिशास्त्री (सीएसडीएस) और नामवर सिंह, प्रधान संपादक, आलोचना। रवीश ने कहा कि आप सबके पास छह-छह मिनट हैं। इसमें ही आपको ‘भारतीय जनतंत्र का जायजा’ लेना है। इसके बाद सवाल-जवाब का दौर होगा। उन्होंने कहा कि वह एक किस्म के उत्तरवाद से घिर गए हैं और इससे निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता। उनका आशय ‘नार्थ’ से था ‘आंसर’ से नहीं। यह कहकर कि नार्थ के लोग रोज बनने वाले इतिहास में उन्हें मौकापरस्त लगते हैं, उन्होंने यह भी कहा, ‘‘मैं सजग हूं, भावुक नहीं हूं।’’ बाकी जो है सो तो...

आदित्य निगम ने रवीश से कहा कि ये स्टूडियो नहीं है और यहां कमर्शियल ब्रेक और तालियों की जरूरत नहीं है। आपने चार मिनट को बढ़ाकर छह मिनट किया, इसके लिए शुक्रगुजार हूं। आदित्य नर्वस और लड़खड़ाए हुए नजर आए। ऐसे मौकों पर ऐसे व्यक्तित्वों को शराब पीकर आना चाहिए, क्योंकि छह मिनट में ‘भारतीय जनतंत्र का जायजा’ होश में नहीं लिया जा सकता। वह बारह मिनट बोले और उन्होंने इस बीच राजनीति और सियासत का फर्क समझाया। उन्होंने कहा कि राजनीति समाज में हर जगह चलती है, लेकिन सियासत हर जगह नहीं होती। वह एक लम्हा है जो यकायक होता है और बने-बनाए खेल को बिगाड़कर चला जाता है। उन्होंने दो प्रस्थापनाएं भी दीं, लेकिन वे यकायक समझ में नहीं आईं और बना-बनाया खेल बिगाड़कर चली गईं।

बाद इसके न जाने क्यों रवीश कुमार ने नामवर सिंह को बोलने को कहा? नामवर ने कहा, ‘‘मैं वक्ता नहीं हूं, लेकिन आदेश हुआ है तो बोलूंगा। राजनीति मेरा विषय नहीं है। मैं साहित्य का विद्यार्थी हूं। साहित्य में यह देखा जाता है कि कंटेंट और फॉर्म एक दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं। मैं ऐसे ही राजनीति को भी जांचता हूं।’’ उन्होंने चुनाव को फॉर्म और तानाशाही को कंटेंट बताया या बताना चाहा। उन्होंने गजब अय्यारी दर्शाते हुए दबी जुबान में नरेंद्र मोदी की तुलना हिटलर से की। यहां गौरतलब है कि कुछ रोज पूर्व भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान समारोह में नामवर सिंह ने नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की थी। नामवर छह मिनट ही बोले और उन्हें देखकर लगा कि यह शख्स दो मिनट में भी ‘भारतीय जनतंत्र का जायजा’ ले सकता है।       

रवीश कुमार ने बर्लिन का एक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि अब वहां कोई हिटलर को याद नहीं करता। उन्होंने नामवर सिंह को पुरानी शब्दावली का व्यक्ति बताया और अनुपमा रॉय को पुकारा।

अनुपमा ने रवीश की अमरोहा वाली रिपोर्ट की तारीफ की, अपूर्वानंद को धन्यवाद दिया और कहा कि मैंने ‘आलोचना’ के ये दोनों अंक ठीक से नहीं पढ़े हैं। लेकिन नामवर जी कह रहे हैं तो जरूर ये अंक अविस्मरणीय होंगे। अनुपमा को देखकर लगा कि वह जन-तंत्र-तंत्र-जन-जन-तंत्र-तंत्र-जन... में ही छह मिनट गुजार देंगी। लेकिन वह जल्द ही फॉर्म में आईं और कंटेंट में भी जब उन्होंने कहा कि राज्य समाज से पृथक नहीं है। शक्ति का वितरण जिस तरह हुआ है उसी का संचित स्वरूप राज्य है। जनतांत्रिकता का पर्याय केवल लोकतांत्रिक संप्रभुता है। उनके संदर्भ चुराए हुए लग रहे थे, लेकिन मुझे यकीन है कि अगर उन्हें छह मिनट से ज्यादा वक्त मिला होता तो उन्होंने स्रोत जरूर बताए होते।

हिलाल अहमद ने कहा कि मैं मुसलमान हूं। मुसलमान कभी शासक थे, अब शासित हैं और आज उनके लिए सच्चर कमीशन की वही अहमियत है जो ‘कुरआन’ और ‘हदीस’ की है। उन्होंने मुसलमानों को लेकर भारतीय समाज में मौजूद पूर्वाग्रह और कॉमनसेंस के फर्क को समझाने के लिए ‘थ्री इडियट’ और ‘पीके’ का सहारा लिया। सुनकर ताज्जुब हो सकता है कि इस सबके लिए उन्होंने महज आठ मिनट खर्च किए।

‘प्राइम टाइम’ के बाद संपन्न हुए सवाल-जवाब वाले राउंड में मैं सभागार से बाहर चला आया। वातानुकूलन में कुछ गड़बड़ी थी और गर्मी से सिर भन्नाने लगा था। वक्त अब कुछ इस कदर है कि सारे सवालों के जवाब मिनटों में दिए जा सकते हैं। हर शै पर मक्खियां मंडरा रही हैं। जीवन की सारी मिठास पर अब मक्खियों का शोर है। अभीष्टों को चढ़ाए गए चढ़ावे पर मक्खियां हैं। पूर्वजों को अर्पित किए गए पुष्पों पर मक्खियां हैं। हमारा कीचड़ तक मक्खियों ने ले लिया, हमारा दलदल तक...

मैं श्रीराम सेंटर की ओर बढ़ गया। कवि निलय उपाध्याय अपनी किताब ‘गंगोत्री से गंगासागर तक’ खड़े होकर बेच रहे थे। इस पुस्तक का लोकार्पण तीन दिन पहले गोविंदाचार्य करने वाले थे, किया नहीं। एक दिन पहले प्रकाशक ने इस किताब को बेचने से मना कर दिया और सारी किताबें निलय के सिर पर पटक गया।

मैं श्रीराम सेंटर रंगमंडल द्वारा प्रस्तुत यूरीपीडिज का नाटक ‘मीडिया’ देखने पहुंचता हूं। वह भी अपने विन्यास और प्रस्तुतिकरण में बहुत खराब प्रतीत होता है। बाहर आता हूं एक कवि मिलता है और देवीप्रसाद मिश्र की एक कविता याद आती है :

सारे सांस्कृतिक हादसे श्रीराम सेंटर के आस-पास ही होते हैं
वहीं एक ने मेरा कॉलर यह कहते हुए पकड़ लिया
कि तुम कहते हुए घूम रहे हो
कि मुझे कवि होने की जिद नहीं करनी चाहिए

मैंने यह कहा तो था
लेकिन इस मरदूद तक यह बात पहुंची तो कैसे

मैंने जान छुड़ाने के लिए उससे कह दिया
कि मैंने आपके बारे में सिर्फ यह कहा था
कि आपको मनुष्य होने की जिद नहीं करनी चाहिए

घबराहट में निकली मेरी इस बात को
उसने इलहाम में निकली बात मान लिया
और मुझसे ज्यादा घबरा गया
कि इस कमबख्त को इसका भी पता था...  
*** 

Saturday, December 27, 2014

2014 की चौदह किताबें



‘तद्भव’ के 30वें अंक में वरिष्ठ कवि अरुण कमल अपने आत्मकथात्मक-वृत्तांत में कहते हैं, ‘‘बहुत से लोग आते हैं, कोई विज्ञप्ति चाहता है, कोई प्रशंसा, कोई लोकार्पण। इनमें से अधिसंख्य ने मेरी एक भी पंक्ति नहीं पढ़ी होती। …अगले जन्म में अगर मैं कुत्ता हुआ तो इनको जरूर काटूंगा। इस जन्म में तो कुछ न कर सका। वाल्टर बेन्यामिन ने ऐसे ही लोगों को लक्ष्य करके कहा था कि इनके साथ इनके प्रकाशकों को भी दंडित किया जाना चाहिए। लिखना और छपना इतना आसान भी नहीं होना चाहिए।’’ 

प्रस्तुत उद्धरण के प्रकाश में अगर वर्ष 2014 के हिंदी साहित्य पर निगाह डाली जाए तो नजर आएगा कि लिखना और छपना इतना आसान यहां कभी भी नहीं था। इन दिनों नए-नए ट्रेंड आ रहे हैं और लोकप्रियता पर नए सिरे से बहस जारी है। इस लोकप्रियता में निश्चित तौर पर धंधेबाजी के सूत्र भी हैं, लेकिन फिलहाल इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। हिंदी में ऐसे रचनाकारों की एक भीड़ आ गई है जो हिंदी की कथित मुख्यधारा से बाहर के हैं, लघु पत्रिकाओं में छपकर जिन्होंने अपनी पहचान अर्जित नहीं की। ये रचनाकार विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों और लेखक-संगठनों से निकलकर नहीं आए। वैचारिकता और जन-सरोकारों का कोई ताप भी इनमें नहीं है। इनके पीछे नए प्रकाशन-विकल्प, तकनीक और बाजार का वह सम्मिश्रण है जो मुख्यधारा के लिए दूषित है। यह सम्मिश्रण इन्हें आगे लाया है और लग रहा है कि आगामी वक्त में और भी आगे ले जाएगा। यह अलग बात है कि वास्तविक और गंभीर कृतियां अब तक इनके पास नहीं हैं। लेकिन ये वह पुल बना सकते हैं जो टी.वी. चैनल्स और इंटरनेट की बाढ़ में लुगदी साहित्य की अप्रासंगिकता के बाद टूट गया और जिसके रास्ते बहुत सारे पाठक देश-दुनिया के वास्तविक और गंभीर साहित्य तक आते  थे। इन रचनाकारों की प्रासंगिकता फिलहाल पुल बनाने में ही है। इसमें ही इनका और उस साहित्य का भविष्य है जो अब तक रस्सी जल गई, लेकिन बल नहीं गया वाले में मुहावरे में जीता है।

इस टूटे पुल की निर्माणाधीनता में इस वर्ष जयपुर से रायपुर तक, भारत भवन से रवींद्र भवन तक और प्रगति मैदान से गांधी मैदान तक साहित्य और साहित्येतर चर्चाएं होती रहीं। पत्रिकाओं, ब्लॉग्स और ‘फेसबुक’ पर विवाद और सूचनाएं आती-जाती रहीं। नए पुरस्कारों का गठन हुआ और पुराने प्रतिवर्ष प्रदान करने की बाध्यता से ग्रस्त रहे। कुछ संस्थानों के निदेशक और कुछ पत्रिकाओं के संपादक बदल गए। कुछ नई पत्रिकाएं शुरू हुईं तो कई पुरानी पत्रिकाएं बंद हो गईं। कुछ नए प्रकाशन सामने आए तो पुराने और प्रतिष्ठित प्रकाशनों ने अपने नए उपक्रम लॉन्च किए। कुछ नए रचनाकारों ने मुहावरे में कहें तो भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाई और कई नए रचनाकारों ने ‘हिंदीसाहित्यसंसार’ में प्रवेश लिया तो देश-दुनिया और हमारी भाषा के कई रचनाकारों का रचा ही अब शेष रह गया, जैसे : गैब्रियल गार्सिया मार्केज, नादिन गॉर्डिमर, तादेऊष रोजेविच, माया एंजेलो, यू आर अनंतमूर्ति, नवारुण भट्टाचार्य, नामदेव ढसाल, अमरकांत, खुशवंत सिंह, जगदंबा प्रसाद दीक्षित, मदनलाल मधु, अशोक सेकसरिया, ज्योत्स्ना मिलन, मधुकर सिंह, रॉबिन शॉ पुष्प, तेज सिंह, सुरेश पंडित, आनंद संगीत, नंद चतुर्वेदी...। 

इस परिदृश्य में मैं हिंदी साहित्य से वर्ष 2014 की 14 किताबें चुनना चाहता हूं। ‘‘प्रत्येक चुनाव में व्यक्तिगत सीमाएं और रुचियां जरूरी भूमिका निभाती हैं’’— ऐसे अवसरों पर बहुधा उद्धृत इस वाक्य के बाद यह कहने से कि यह चयन भी अंतिम और निर्दोष नहीं है, मेरा काम कुछ कम मुश्किल हो जाता है। 

उपन्यास

‘चलती है गाड़ी उड़ती है धूल’ वाले अंदाज में हिंदी में इस वर्ष बहुत सारे उपन्यास आए और गए, लेकिन यहां चर्चा-योग्य मैं सिर्फ दो ही उपन्यासों को पा रहा हूं— काशीनाथ सिंह का ‘उपसंहार’ और अखिलेश का ‘निर्वासन’। ये दोनों ही उपन्यासकार वरिष्ठ हैं। दरअसल, कई युवा कवि और कहानीकार गए कुछ वर्षों में उपन्यास-लेखन की ओर प्रवृत्त तो हुए हैं, लेकिन यह एकदम स्पष्ट है कि यह विधा अभी उनसे सध नहीं रही। बात करें ‘उपसंहार’ की तो यह कृष्ण के अंतिम दिनों की कथा है। यह कथा ईश्वर के बहाने मनुष्य की कथा कहती है और सत्ता और युद्ध के दुष्प्रभावों के बीच संवेदनाओं और प्रेम के संकट और व्याख्या को उकेरती है।

‘निर्वासन’ को लेकर बहुत बहस चली और इस पर हुई चर्चाओं के साहित्येतर निहितार्थ भी खोजे गए। इसे बगैर पढ़े या अधूरा पढ़कर भी इस पर टीका-टिप्पणी का आलम रहा। लेकिन आसान बातें कैसे मकसद बन जाती हैं, यह जानने के लिए इस उपन्यास के नजदीक जाना चाहिए। यह कुछ देर के लिए अवसाद में ले जाता है तो जो पहले से ही अवसाद में हैं, उन्हें कुछ देर के लिए अवसाद से बाहर लाता है। यह भावुक करता है और कहता है कि तुम मुझे बुरा कैसे कह सकते हो मैंने तुम्हें रुलाया है। मैं तुम्हारी स्थानीयताओं का विश्लेषण हूं, मैं तुम्हारी स्मृतियों की अभिव्यक्ति हूं।

कहानी

‘हॉर्न दीजिए, साइड लीजिए’ वाले अंदाज में इस वर्ष बहुत सारे कहानी-संग्रह भी आए और गए, लेकिन चर्चा-योग्य मैं सिर्फ चार को ही पा रहा हूं— योगेंद्र आहूजा का ‘पांच मिनट और अन्य कहानियां’, पंकज मित्र का ‘जिद्दी रेडियो’, मनोज कुमार पांडेय का ‘पानी’ और आशुतोष का ‘मरें तो उम्र भर के लिए’।

‘पांच मिनट और अन्य कहानियां’ से बेहतर कहानी-संग्रह इस वर्ष हिंदी में ढूंढ़े नहीं मिलेगा। त्रासदी यह है कि इस संग्रह की कोई समीक्षा नहीं आई— ‘फेसबुक’ पर एक टिप्पणी तक नहीं। आयोजन, चर्चाएं, समीक्षाएं और टिप्पणियां... हिंदी में आजकल जनसंपर्क, ताकत और पैसे का खेल होती जा रही हैं, ऐसे में योगेंद्र आहूजा जैसे आत्मप्रचार और जनसंपर्क से दूर ईमानदार व्यक्ति/लेखक के कहानी-संग्रह पर चुप्पी स्वभाविक है। ‘एक्यूरेट पैथोलॉजी’, ‘स्त्री विमर्श’, ‘पांच मिनट’ और ‘खाना’ जैसी कहानियों के साथ-साथ इस संग्रह में योगेंद्र आहूजा का आत्मकथ्य भी है।

‘जिद्दी रेडियो’ में टिपिकल पंकज मित्र टाइप कहानियां हैं। वह आगे नहीं बढ़े हैं, लेकिन उनकी कहानियां अब भी उल्लेखनीय, महत्वपूर्ण और पढ़े जाने लायक हैं। 

‘पानी’ की कहानियों में लोक और प्रतीक कथाओं का परिवेश है। ‘पानी’, ‘पुरोहित जिसने मछलियां पाली’, ‘पत्नी चेहरा’ और ‘जींस’ इस संग्रह की महत्वपूर्ण कहानियां हैं।

‘मरें तो उम्र भर के लिए’ की कहानियां भी इस बात की तस्दीक करती हैं कि हिंदी में युवा रचनाकार अब भी उपन्यास की तुलना में लंबी कहानी बेहतर लिख रहे हैं।

कविता

‘होश आया भी तो कह दूंगा कि मुझे होश नहीं’ वाले अंदाज में इस वर्ष बहुत सारे कविता-संग्रह भी आए और गए, लेकिन चर्चा-योग्य मैं सिर्फ चार को ही पा रहा हूं— केदारनाथ सिंह का ‘सृष्टि पर पहरा’, ऋतुराज का ‘फेरे’, अजंता देव का ‘घोड़े की आंखों में आंसू’ और प्रभात का ‘अपनों में नहीं रह पाने का गीत’।

केदारनाथ सिंह ने जो मुहावरा साधा है उस मुहावरे से बाहर जाने की उन्होंने कभी कोई कोशिश नहीं की है। एक ऐसे हिंदी कविता-समय में जब खुद को क्रास करने के चक्कर में केदारनाथ सिंह से उम्र में कम कई वरिष्ठ कवियों की सांस फूलने लगी हैं। केदारनाथ सिंह बहुत आराम और शाइस्तगी से चल रहे हैं, हालांकि देख वह वही सब रहे हैं जो पहले देख चुके हैं। इस देख चुके को देखने के लिए ही वह बार-बार देखी जा चुकी जगहों पर लौटते हैं। ‘सृष्टि पर पहरा’ की कविताएं पढ़ते हुए कहीं ऐसा नहीं लगता कि इस प्रक्रिया और चाल-चलन ने उन्हें बिलकुल भी थकाया है।

ऋतुराज का कवि-व्यक्तित्व केदारनाथ सिंह से बिलकुल फर्क है। संग्रह-दर-संग्रह उनके कवि का दायरा बढ़ता जाता है। ‘फेरे’ में मौजूद कविताएं भी इसकी बानगी हैं। 

‘घोड़े की आंखों में आंसू’ अजंता देव का तीसरा कविता-संग्रह है और यह उनके काव्य-विस्तार का प्रमाण है। इस संग्रह की कविताएं फार्मूलों से इस कदर दूर हैं कि यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि हिंदी की कई वरिष्ठ लेखिकाओं को इनके पास शऊर मांगने जाना चाहिए।

‘अपनों में नहीं रह पाने का गीत’ में अपनी तरह का लोक और संवेदनाएं हैं। बहुत सारे अवसाद के बीच बहुत सारी आशा का स्वर इन कविताओं को विशिष्ट बनाता है।

[‘‘असद जैदी के तीनों पूर्व प्रकाशित कविता-संग्रह भी इस वर्ष एक जिल्द में ‘सरे-शाम’ नाम से शाया हुए’’—  इस वाक्य को यहां सारी गणनाओं से बाहर पढ़ा जाए।] 

आलोचना

हिंदी में अकादमिक आलोचना बहुत सारे उद्धरणों को एक जगह रख देने का नाम है, लेकिन फिर भी ‘यूं न था, मैंने फकत चाहा था यूं हो जाए’ वाले अंदाज में आलोचना की भी कई पुस्तकें इस वर्ष आईं और गईं। मैं यहां कोई टिपिकल आलोचना-पुस्तक न चुनकर दो ऐसी किताबों का उल्लेख करूंगा जिन्होंने इस वर्ष हिंदी आलोचना को नई छवि दी। इनमें पहली है डायरीनुमा आलोचना— अनुराग वत्स के संपादन में आई कुंवर नारायण की ‘रुख’ और दूसरी है विनिबंधीय आलोचना— ‘रघुवीर सहाय’ पर पंकज चतुर्वेदी का द्वारा लिखा गया मोनोग्राफ। 

संस्मरण

केवल एक— मालचंद तिवाड़ी कृत ‘बोरूंदा डायरी’। यह पुस्तक विजयदान देथा उर्फ बिज्जी का विदा-गीत है। डायरी शैली में लिखे गए इन संस्मरणों को पढ़कर बिज्जी से संबद्ध सारे संसारों को जाना जा सकता है।

विविध  

मैं यहां ‘उद्भ्रांत’ हो गया हूं, अब मुझे केवल एक पुस्तक चुननी है और मेरे पास तीन विकल्प हैं— मंगलेश डबराल के साक्षात्कारों का संचयन ‘उपकथन’, कृष्ण कुमार की पुस्तक ‘चूड़ी बाजार में लड़की’ और प्रमोद सिंह की गद्य के कई रंग दिखाने वाली ‘अजाने मेलों में’। ‘‘प्रत्येक चुनाव में व्यक्तिगत सीमाएं और रुचियां जरूरी भूमिका निभाती हैं’’— इसलिए मैं चाहता हूं इन पंक्तियों को पढ़ने वाले इन सीमाओं और रुचियों का अतिक्रमण कर इस स्थान पर इन तीन में से कोई भी एक पुस्तक रख सकते हैं। मुझे रखना होगा तो मैं ‘अजाने मेलों में’ को रखूंगा। यह पुस्तक एकालाप और सुख की प्रतीक्षा के असंख्य ढंग सिखाती है। 

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...और आखिर मैं यह कहना आवश्यक है कि मैंने यह सब उस छात्र की तरह लिखा है जिसे सारे उत्तर पता होते हैं, लेकिन वक्त की कमी के चलते जो पर्चा पूरा कर नहीं पाता। 

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[ ‘दि संडे पोस्ट’ में प्रकाशित ]
तस्वीर : Christine Ellger