Saturday, June 20, 2015

‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ पर पंकज चतुर्वेदी की एक कविता


आइए 

समलैंगिकता एक प्यार है
इंसान का इंसान से
ज़रूरी नहीं लैंगिकता का
ख़याल रखकर किया जाए

एक समाचार चैनल पर
समलैंगिकता पर बहस में
बाबा रामदेव ने कहा :
यह भारतीय संस्कृति के खि़लाफ़ है
अप्राकृतिक है
मानसिक विकृति है
और अगर सुप्रीम कोर्ट, सरकार और लोग
यह नहीं समझते
तो वे भी भारतीय संस्कृति के खि़लाफ़ हैं

समलैंगिकों के प्रवक्ता का कहना था
कि दुनिया के मशहूर मनोवैज्ञानिकों की राय है
कि समलैंगिक सम्बन्ध
दिमाग़ी ख़राबी नहीं
बल्कि इंसान की
ख़ास आंतरिक बनावट का नतीजा हैं

एक और समलैंगिक ने
एक पत्रिका में अपने इंटरव्यू में पूछा
कि खजुराहो, दहोद और मोधरा की मूर्तियों में
और हमारे प्राचीन ग्रंथ ‘कामसूत्र’ में
समलैंगिकता के रहे होने के सुबूत मिलते हैं
फिर कैसे इसे कुछ लोग
पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित परिघटना बताते हैं

बहरहाल, चैनल पर बाबा रामदेव ने
आगे कहा :
समलैंगिकता की व्याधि से
छुटकारे का उपाय है
प्राणायाम

समलैंगिकों के पैरवीकार ने
अपने तर्कों से
बाबा को मुत्मइन करने की
काफ़ी चेष्टा की
पर अंत में खीजकर कहा :
क्या प्राणायाम, प्राणायाम
प्राणायाम से कुछ नहीं होता है

मगर बाबा इस बात पर अड़े रहे
कि प्राणायाम से
सब ठीक हो सकता है

आइए रामदेव जी !
बावजूद इसके कि वे लोग प्राणायाम जानते हैं
प्राणायाम के राजपथ पर
भारतीय संस्कृति की
छतरी के नीचे
उन्हें धकियाते हुए चलें !
***
साभार : कवि के सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह ‘रक्तचाप और अन्य कविताएं’ से 

Sunday, June 7, 2015

कि जैसे मुझे इसका भी पता था



इस मंच पर विराजमान ये सभी लोग
खोए हुए लोग हैं

इनके नाम के बातस्वीर इश्तिहार भी
शायद निकले हुए हों

जो मनुष्य अभी अध्यक्षता कर रहा है
सबसे ज्यादा खोया हुआ पुरुष है

उसका सब कुछ उससे खो गया है

वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी की यह कविता मैं नामवर सिंह को जब जब मंच पर देखता हूं, याद आती है। हालांकि शनिवार 6 जून 2015 की शाम साहित्य अकादेमी सभागार, नई दिल्ली में नामवर अध्यक्ष नहीं, ‘विशिष्ट उपस्थिति’ थे। लेकिन उनका सब कुछ अब उनसे खो गया है, इसकी सूचना वह अपनी प्रत्येक उपस्थिति में दर्ज करवा ही देते हैं। इस बार प्रसंग था ‘आलोचना’ के दो अंकों (53-54) के प्रकाशन के उपलक्ष्य में ‘भारतीय जनतंत्र का जायजा’ विषय पर केंद्रित परिचर्चा। वक्ताओं में गोपाल गुरु का भी नाम था, लेकिन वह क्यों नामौजूद रहे इसकी कोई जानकारी इस कार्यक्रम के दरमियान नहीं दी गई। आज से करीब दो माह पूर्व इसी सभागार में बीसवें देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह का संचालन करते हुए अशोक वाजपेयी ने साहसिकता को व्यर्थ बताते हुए कहा था कि आजकल कहीं बुलाए जाने पर न आने के कारण बहुत हो गए हैं, ब्लड प्रेशर भी उनमें से एक है। अशोक वाजपेयी नाम का व्यक्तित्व जब बोलता है या जब ‘कभी-कभार’ लिखता है तो लगता है बहुत जूस पीकर बोल रहा है या बहुत बादाम खाकर लिख रहा है। उसके लिखे या बोले में उसके मौजूदा समय का कोई संकट और बेचैनी नहीं होती, या ‘आलोचना’ के नए संपादक अपूर्वानंद के शब्दों में कहें तो कह सकते हैं कि ‘भारतीय जनतंत्र का जायजा’ नहीं होता। वर्ना क्या वजह रही इस कार्यक्रम का संचालन अशोक वाजपेयी ने नहीं लघुप्रेमकथाकार रवीश कुमार ने किया। इस तरह देखें तो... या न भी देखें तो क्या फर्क पड़ता है...

सभागार दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं-शोधकर्ताओं और प्राध्यापकों से खचाखच भरा था, मुहावरे में कहें तो तिल रखने की भी...

अपूर्वानंद ने कार्यक्रम की शुरुआत ‘आलोचना’ के परिचय से और यह कहते हुए की कि जो जितना ही नौजवान है, वह उतना ही फर्श पर बैठे। विनोद तिवारी को बैठने को सीट नहीं मिल रही थी और उधर अपूर्वानंद बता रहे थे कि कैसे गए दिनों में दुनिया भर में ब्लॉगर्स की हत्याएं हुई हैं। उन्होंने यह भी कहा, ‘‘कुछ लोगों को इस पर आपत्ति हो सकती है कि क्यों एक साहित्यिक आलोचना की पत्रिका समाज वैज्ञानिक विषय पर अपने अंक केंद्रित करे, लेकिन ‘आलोचना’ की दिलचस्पी बतौर पत्रिका राजनीति में हमेशा से रही है।’’ ‘आलोचना’ की दिलचस्पी बतौर पत्रिका नामवर सिंह में भी हमेशा से...

लेकिन ‘आलोचना’ की दिलचस्पी अब कविता में क्यों नहीं है... इस प्रश्न के उत्तर के लिए मुझे एक बार पुन: असद ज़ैदी को याद करना होगा :

एक कविता जो पहले ही से खराब थी
होती जा रही है अब और खराब

कोई इंसानी कोशिश उसे सुधार नहीं सकती
मेहनत से और बिगाड़ होता है पैदा
वह संगीन से संगीनतर होती जाती
एक स्थायी दुर्घटना है
सारी रचनाओं को उसकी बगल से
लंबा चक्कर काटकर गुजरना पड़ता है

मैं क्या करूं उस शिथिल
सीसे-सी भारी काया का
जिसके आगे प्रकाशित कविताएं महज तितलियां हैं और
सारी समालोचना राख

मनुष्यों में वह सिर्फ मुझे पहचानती है
और मैं भी मनुष्य जब तक हूं तब तक हूं

फिलहाल ‘प्राइम टाइम’ शुरू हुआएंकर : रवीश कुमार और उनके साथ थे आदित्य निगम, राजनीतिशास्त्री (सीएसडीएस), अनुपमा रॉय, राजनीतिशास्त्री (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय), हिलाल अहमद, राजनीतिशास्त्री (सीएसडीएस) और नामवर सिंह, प्रधान संपादक, आलोचना। रवीश ने कहा कि आप सबके पास छह-छह मिनट हैं। इसमें ही आपको ‘भारतीय जनतंत्र का जायजा’ लेना है। इसके बाद सवाल-जवाब का दौर होगा। उन्होंने कहा कि वह एक किस्म के उत्तरवाद से घिर गए हैं और इससे निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता। उनका आशय ‘नार्थ’ से था ‘आंसर’ से नहीं। यह कहकर कि नार्थ के लोग रोज बनने वाले इतिहास में उन्हें मौकापरस्त लगते हैं, उन्होंने यह भी कहा, ‘‘मैं सजग हूं, भावुक नहीं हूं।’’ बाकी जो है सो तो...

आदित्य निगम ने रवीश से कहा कि ये स्टूडियो नहीं है और यहां कमर्शियल ब्रेक और तालियों की जरूरत नहीं है। आपने चार मिनट को बढ़ाकर छह मिनट किया, इसके लिए शुक्रगुजार हूं। आदित्य नर्वस और लड़खड़ाए हुए नजर आए। ऐसे मौकों पर ऐसे व्यक्तित्वों को शराब पीकर आना चाहिए, क्योंकि छह मिनट में ‘भारतीय जनतंत्र का जायजा’ होश में नहीं लिया जा सकता। वह बारह मिनट बोले और उन्होंने इस बीच राजनीति और सियासत का फर्क समझाया। उन्होंने कहा कि राजनीति समाज में हर जगह चलती है, लेकिन सियासत हर जगह नहीं होती। वह एक लम्हा है जो यकायक होता है और बने-बनाए खेल को बिगाड़कर चला जाता है। उन्होंने दो प्रस्थापनाएं भी दीं, लेकिन वे यकायक समझ में नहीं आईं और बना-बनाया खेल बिगाड़कर चली गईं।

बाद इसके न जाने क्यों रवीश कुमार ने नामवर सिंह को बोलने को कहा? नामवर ने कहा, ‘‘मैं वक्ता नहीं हूं, लेकिन आदेश हुआ है तो बोलूंगा। राजनीति मेरा विषय नहीं है। मैं साहित्य का विद्यार्थी हूं। साहित्य में यह देखा जाता है कि कंटेंट और फॉर्म एक दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं। मैं ऐसे ही राजनीति को भी जांचता हूं।’’ उन्होंने चुनाव को फॉर्म और तानाशाही को कंटेंट बताया या बताना चाहा। उन्होंने गजब अय्यारी दर्शाते हुए दबी जुबान में नरेंद्र मोदी की तुलना हिटलर से की। यहां गौरतलब है कि कुछ रोज पूर्व भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान समारोह में नामवर सिंह ने नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की थी। नामवर छह मिनट ही बोले और उन्हें देखकर लगा कि यह शख्स दो मिनट में भी ‘भारतीय जनतंत्र का जायजा’ ले सकता है।       

रवीश कुमार ने बर्लिन का एक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि अब वहां कोई हिटलर को याद नहीं करता। उन्होंने नामवर सिंह को पुरानी शब्दावली का व्यक्ति बताया और अनुपमा रॉय को पुकारा।

अनुपमा ने रवीश की अमरोहा वाली रिपोर्ट की तारीफ की, अपूर्वानंद को धन्यवाद दिया और कहा कि मैंने ‘आलोचना’ के ये दोनों अंक ठीक से नहीं पढ़े हैं। लेकिन नामवर जी कह रहे हैं तो जरूर ये अंक अविस्मरणीय होंगे। अनुपमा को देखकर लगा कि वह जन-तंत्र-तंत्र-जन-जन-तंत्र-तंत्र-जन... में ही छह मिनट गुजार देंगी। लेकिन वह जल्द ही फॉर्म में आईं और कंटेंट में भी जब उन्होंने कहा कि राज्य समाज से पृथक नहीं है। शक्ति का वितरण जिस तरह हुआ है उसी का संचित स्वरूप राज्य है। जनतांत्रिकता का पर्याय केवल लोकतांत्रिक संप्रभुता है। उनके संदर्भ चुराए हुए लग रहे थे, लेकिन मुझे यकीन है कि अगर उन्हें छह मिनट से ज्यादा वक्त मिला होता तो उन्होंने स्रोत जरूर बताए होते।

हिलाल अहमद ने कहा कि मैं मुसलमान हूं। मुसलमान कभी शासक थे, अब शासित हैं और आज उनके लिए सच्चर कमीशन की वही अहमियत है जो ‘कुरआन’ और ‘हदीस’ की है। उन्होंने मुसलमानों को लेकर भारतीय समाज में मौजूद पूर्वाग्रह और कॉमनसेंस के फर्क को समझाने के लिए ‘थ्री इडियट’ और ‘पीके’ का सहारा लिया। सुनकर ताज्जुब हो सकता है कि इस सबके लिए उन्होंने महज आठ मिनट खर्च किए।

‘प्राइम टाइम’ के बाद संपन्न हुए सवाल-जवाब वाले राउंड में मैं सभागार से बाहर चला आया। वातानुकूलन में कुछ गड़बड़ी थी और गर्मी से सिर भन्नाने लगा था। वक्त अब कुछ इस कदर है कि सारे सवालों के जवाब मिनटों में दिए जा सकते हैं। हर शै पर मक्खियां मंडरा रही हैं। जीवन की सारी मिठास पर अब मक्खियों का शोर है। अभीष्टों को चढ़ाए गए चढ़ावे पर मक्खियां हैं। पूर्वजों को अर्पित किए गए पुष्पों पर मक्खियां हैं। हमारा कीचड़ तक मक्खियों ने ले लिया, हमारा दलदल तक...

मैं श्रीराम सेंटर की ओर बढ़ गया। कवि निलय उपाध्याय अपनी किताब ‘गंगोत्री से गंगासागर तक’ खड़े होकर बेच रहे थे। इस पुस्तक का लोकार्पण तीन दिन पहले गोविंदाचार्य करने वाले थे, किया नहीं। एक दिन पहले प्रकाशक ने इस किताब को बेचने से मना कर दिया और सारी किताबें निलय के सिर पर पटक गया।

मैं श्रीराम सेंटर रंगमंडल द्वारा प्रस्तुत यूरीपीडिज का नाटक ‘मीडिया’ देखने पहुंचता हूं। वह भी अपने विन्यास और प्रस्तुतिकरण में बहुत खराब प्रतीत होता है। बाहर आता हूं एक कवि मिलता है और देवीप्रसाद मिश्र की एक कविता याद आती है :

सारे सांस्कृतिक हादसे श्रीराम सेंटर के आस-पास ही होते हैं
वहीं एक ने मेरा कॉलर यह कहते हुए पकड़ लिया
कि तुम कहते हुए घूम रहे हो
कि मुझे कवि होने की जिद नहीं करनी चाहिए

मैंने यह कहा तो था
लेकिन इस मरदूद तक यह बात पहुंची तो कैसे

मैंने जान छुड़ाने के लिए उससे कह दिया
कि मैंने आपके बारे में सिर्फ यह कहा था
कि आपको मनुष्य होने की जिद नहीं करनी चाहिए

घबराहट में निकली मेरी इस बात को
उसने इलहाम में निकली बात मान लिया
और मुझसे ज्यादा घबरा गया
कि इस कमबख्त को इसका भी पता था...  
*** 

Saturday, December 27, 2014

2014 की चौदह किताबें



‘तद्भव’ के 30वें अंक में वरिष्ठ कवि अरुण कमल अपने आत्मकथात्मक-वृत्तांत में कहते हैं, ‘‘बहुत से लोग आते हैं, कोई विज्ञप्ति चाहता है, कोई प्रशंसा, कोई लोकार्पण। इनमें से अधिसंख्य ने मेरी एक भी पंक्ति नहीं पढ़ी होती। …अगले जन्म में अगर मैं कुत्ता हुआ तो इनको जरूर काटूंगा। इस जन्म में तो कुछ न कर सका। वाल्टर बेन्यामिन ने ऐसे ही लोगों को लक्ष्य करके कहा था कि इनके साथ इनके प्रकाशकों को भी दंडित किया जाना चाहिए। लिखना और छपना इतना आसान भी नहीं होना चाहिए।’’ 

प्रस्तुत उद्धरण के प्रकाश में अगर वर्ष 2014 के हिंदी साहित्य पर निगाह डाली जाए तो नजर आएगा कि लिखना और छपना इतना आसान यहां कभी भी नहीं था। इन दिनों नए-नए ट्रेंड आ रहे हैं और लोकप्रियता पर नए सिरे से बहस जारी है। इस लोकप्रियता में निश्चित तौर पर धंधेबाजी के सूत्र भी हैं, लेकिन फिलहाल इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। हिंदी में ऐसे रचनाकारों की एक भीड़ आ गई है जो हिंदी की कथित मुख्यधारा से बाहर के हैं, लघु पत्रिकाओं में छपकर जिन्होंने अपनी पहचान अर्जित नहीं की। ये रचनाकार विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों और लेखक-संगठनों से निकलकर नहीं आए। वैचारिकता और जन-सरोकारों का कोई ताप भी इनमें नहीं है। इनके पीछे नए प्रकाशन-विकल्प, तकनीक और बाजार का वह सम्मिश्रण है जो मुख्यधारा के लिए दूषित है। यह सम्मिश्रण इन्हें आगे लाया है और लग रहा है कि आगामी वक्त में और भी आगे ले जाएगा। यह अलग बात है कि वास्तविक और गंभीर कृतियां अब तक इनके पास नहीं हैं। लेकिन ये वह पुल बना सकते हैं जो टी.वी. चैनल्स और इंटरनेट की बाढ़ में लुगदी साहित्य की अप्रासंगिकता के बाद टूट गया और जिसके रास्ते बहुत सारे पाठक देश-दुनिया के वास्तविक और गंभीर साहित्य तक आते  थे। इन रचनाकारों की प्रासंगिकता फिलहाल पुल बनाने में ही है। इसमें ही इनका और उस साहित्य का भविष्य है जो अब तक रस्सी जल गई, लेकिन बल नहीं गया वाले में मुहावरे में जीता है।

इस टूटे पुल की निर्माणाधीनता में इस वर्ष जयपुर से रायपुर तक, भारत भवन से रवींद्र भवन तक और प्रगति मैदान से गांधी मैदान तक साहित्य और साहित्येतर चर्चाएं होती रहीं। पत्रिकाओं, ब्लॉग्स और ‘फेसबुक’ पर विवाद और सूचनाएं आती-जाती रहीं। नए पुरस्कारों का गठन हुआ और पुराने प्रतिवर्ष प्रदान करने की बाध्यता से ग्रस्त रहे। कुछ संस्थानों के निदेशक और कुछ पत्रिकाओं के संपादक बदल गए। कुछ नई पत्रिकाएं शुरू हुईं तो कई पुरानी पत्रिकाएं बंद हो गईं। कुछ नए प्रकाशन सामने आए तो पुराने और प्रतिष्ठित प्रकाशनों ने अपने नए उपक्रम लॉन्च किए। कुछ नए रचनाकारों ने मुहावरे में कहें तो भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाई और कई नए रचनाकारों ने ‘हिंदीसाहित्यसंसार’ में प्रवेश लिया तो देश-दुनिया और हमारी भाषा के कई रचनाकारों का रचा ही अब शेष रह गया, जैसे : गैब्रियल गार्सिया मार्केज, नादिन गॉर्डिमर, तादेऊष रोजेविच, माया एंजेलो, यू आर अनंतमूर्ति, नवारुण भट्टाचार्य, नामदेव ढसाल, अमरकांत, खुशवंत सिंह, जगदंबा प्रसाद दीक्षित, मदनलाल मधु, अशोक सेकसरिया, ज्योत्स्ना मिलन, मधुकर सिंह, रॉबिन शॉ पुष्प, तेज सिंह, सुरेश पंडित, आनंद संगीत, नंद चतुर्वेदी...। 

इस परिदृश्य में मैं हिंदी साहित्य से वर्ष 2014 की 14 किताबें चुनना चाहता हूं। ‘‘प्रत्येक चुनाव में व्यक्तिगत सीमाएं और रुचियां जरूरी भूमिका निभाती हैं’’— ऐसे अवसरों पर बहुधा उद्धृत इस वाक्य के बाद यह कहने से कि यह चयन भी अंतिम और निर्दोष नहीं है, मेरा काम कुछ कम मुश्किल हो जाता है। 

उपन्यास

‘चलती है गाड़ी उड़ती है धूल’ वाले अंदाज में हिंदी में इस वर्ष बहुत सारे उपन्यास आए और गए, लेकिन यहां चर्चा-योग्य मैं सिर्फ दो ही उपन्यासों को पा रहा हूं— काशीनाथ सिंह का ‘उपसंहार’ और अखिलेश का ‘निर्वासन’। ये दोनों ही उपन्यासकार वरिष्ठ हैं। दरअसल, कई युवा कवि और कहानीकार गए कुछ वर्षों में उपन्यास-लेखन की ओर प्रवृत्त तो हुए हैं, लेकिन यह एकदम स्पष्ट है कि यह विधा अभी उनसे सध नहीं रही। बात करें ‘उपसंहार’ की तो यह कृष्ण के अंतिम दिनों की कथा है। यह कथा ईश्वर के बहाने मनुष्य की कथा कहती है और सत्ता और युद्ध के दुष्प्रभावों के बीच संवेदनाओं और प्रेम के संकट और व्याख्या को उकेरती है।

‘निर्वासन’ को लेकर बहुत बहस चली और इस पर हुई चर्चाओं के साहित्येतर निहितार्थ भी खोजे गए। इसे बगैर पढ़े या अधूरा पढ़कर भी इस पर टीका-टिप्पणी का आलम रहा। लेकिन आसान बातें कैसे मकसद बन जाती हैं, यह जानने के लिए इस उपन्यास के नजदीक जाना चाहिए। यह कुछ देर के लिए अवसाद में ले जाता है तो जो पहले से ही अवसाद में हैं, उन्हें कुछ देर के लिए अवसाद से बाहर लाता है। यह भावुक करता है और कहता है कि तुम मुझे बुरा कैसे कह सकते हो मैंने तुम्हें रुलाया है। मैं तुम्हारी स्थानीयताओं का विश्लेषण हूं, मैं तुम्हारी स्मृतियों की अभिव्यक्ति हूं।

कहानी

‘हॉर्न दीजिए, साइड लीजिए’ वाले अंदाज में इस वर्ष बहुत सारे कहानी-संग्रह भी आए और गए, लेकिन चर्चा-योग्य मैं सिर्फ चार को ही पा रहा हूं— योगेंद्र आहूजा का ‘पांच मिनट और अन्य कहानियां’, पंकज मित्र का ‘जिद्दी रेडियो’, मनोज कुमार पांडेय का ‘पानी’ और आशुतोष का ‘मरें तो उम्र भर के लिए’।

‘पांच मिनट और अन्य कहानियां’ से बेहतर कहानी-संग्रह इस वर्ष हिंदी में ढूंढ़े नहीं मिलेगा। त्रासदी यह है कि इस संग्रह की कोई समीक्षा नहीं आई— ‘फेसबुक’ पर एक टिप्पणी तक नहीं। आयोजन, चर्चाएं, समीक्षाएं और टिप्पणियां... हिंदी में आजकल जनसंपर्क, ताकत और पैसे का खेल होती जा रही हैं, ऐसे में योगेंद्र आहूजा जैसे आत्मप्रचार और जनसंपर्क से दूर ईमानदार व्यक्ति/लेखक के कहानी-संग्रह पर चुप्पी स्वभाविक है। ‘एक्यूरेट पैथोलॉजी’, ‘स्त्री विमर्श’, ‘पांच मिनट’ और ‘खाना’ जैसी कहानियों के साथ-साथ इस संग्रह में योगेंद्र आहूजा का आत्मकथ्य भी है।

‘जिद्दी रेडियो’ में टिपिकल पंकज मित्र टाइप कहानियां हैं। वह आगे नहीं बढ़े हैं, लेकिन उनकी कहानियां अब भी उल्लेखनीय, महत्वपूर्ण और पढ़े जाने लायक हैं। 

‘पानी’ की कहानियों में लोक और प्रतीक कथाओं का परिवेश है। ‘पानी’, ‘पुरोहित जिसने मछलियां पाली’, ‘पत्नी चेहरा’ और ‘जींस’ इस संग्रह की महत्वपूर्ण कहानियां हैं।

‘मरें तो उम्र भर के लिए’ की कहानियां भी इस बात की तस्दीक करती हैं कि हिंदी में युवा रचनाकार अब भी उपन्यास की तुलना में लंबी कहानी बेहतर लिख रहे हैं।

कविता

‘होश आया भी तो कह दूंगा कि मुझे होश नहीं’ वाले अंदाज में इस वर्ष बहुत सारे कविता-संग्रह भी आए और गए, लेकिन चर्चा-योग्य मैं सिर्फ चार को ही पा रहा हूं— केदारनाथ सिंह का ‘सृष्टि पर पहरा’, ऋतुराज का ‘फेरे’, अजंता देव का ‘घोड़े की आंखों में आंसू’ और प्रभात का ‘अपनों में नहीं रह पाने का गीत’।

केदारनाथ सिंह ने जो मुहावरा साधा है उस मुहावरे से बाहर जाने की उन्होंने कभी कोई कोशिश नहीं की है। एक ऐसे हिंदी कविता-समय में जब खुद को क्रास करने के चक्कर में केदारनाथ सिंह से उम्र में कम कई वरिष्ठ कवियों की सांस फूलने लगी हैं। केदारनाथ सिंह बहुत आराम और शाइस्तगी से चल रहे हैं, हालांकि देख वह वही सब रहे हैं जो पहले देख चुके हैं। इस देख चुके को देखने के लिए ही वह बार-बार देखी जा चुकी जगहों पर लौटते हैं। ‘सृष्टि पर पहरा’ की कविताएं पढ़ते हुए कहीं ऐसा नहीं लगता कि इस प्रक्रिया और चाल-चलन ने उन्हें बिलकुल भी थकाया है।

ऋतुराज का कवि-व्यक्तित्व केदारनाथ सिंह से बिलकुल फर्क है। संग्रह-दर-संग्रह उनके कवि का दायरा बढ़ता जाता है। ‘फेरे’ में मौजूद कविताएं भी इसकी बानगी हैं। 

‘घोड़े की आंखों में आंसू’ अजंता देव का तीसरा कविता-संग्रह है और यह उनके काव्य-विस्तार का प्रमाण है। इस संग्रह की कविताएं फार्मूलों से इस कदर दूर हैं कि यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि हिंदी की कई वरिष्ठ लेखिकाओं को इनके पास शऊर मांगने जाना चाहिए।

‘अपनों में नहीं रह पाने का गीत’ में अपनी तरह का लोक और संवेदनाएं हैं। बहुत सारे अवसाद के बीच बहुत सारी आशा का स्वर इन कविताओं को विशिष्ट बनाता है।

[‘‘असद जैदी के तीनों पूर्व प्रकाशित कविता-संग्रह भी इस वर्ष एक जिल्द में ‘सरे-शाम’ नाम से शाया हुए’’—  इस वाक्य को यहां सारी गणनाओं से बाहर पढ़ा जाए।] 

आलोचना

हिंदी में अकादमिक आलोचना बहुत सारे उद्धरणों को एक जगह रख देने का नाम है, लेकिन फिर भी ‘यूं न था, मैंने फकत चाहा था यूं हो जाए’ वाले अंदाज में आलोचना की भी कई पुस्तकें इस वर्ष आईं और गईं। मैं यहां कोई टिपिकल आलोचना-पुस्तक न चुनकर दो ऐसी किताबों का उल्लेख करूंगा जिन्होंने इस वर्ष हिंदी आलोचना को नई छवि दी। इनमें पहली है डायरीनुमा आलोचना— अनुराग वत्स के संपादन में आई कुंवर नारायण की ‘रुख’ और दूसरी है विनिबंधीय आलोचना— ‘रघुवीर सहाय’ पर पंकज चतुर्वेदी का द्वारा लिखा गया मोनोग्राफ। 

संस्मरण

केवल एक— मालचंद तिवाड़ी कृत ‘बोरूंदा डायरी’। यह पुस्तक विजयदान देथा उर्फ बिज्जी का विदा-गीत है। डायरी शैली में लिखे गए इन संस्मरणों को पढ़कर बिज्जी से संबद्ध सारे संसारों को जाना जा सकता है।

विविध  

मैं यहां ‘उद्भ्रांत’ हो गया हूं, अब मुझे केवल एक पुस्तक चुननी है और मेरे पास तीन विकल्प हैं— मंगलेश डबराल के साक्षात्कारों का संचयन ‘उपकथन’, कृष्ण कुमार की पुस्तक ‘चूड़ी बाजार में लड़की’ और प्रमोद सिंह की गद्य के कई रंग दिखाने वाली ‘अजाने मेलों में’। ‘‘प्रत्येक चुनाव में व्यक्तिगत सीमाएं और रुचियां जरूरी भूमिका निभाती हैं’’— इसलिए मैं चाहता हूं इन पंक्तियों को पढ़ने वाले इन सीमाओं और रुचियों का अतिक्रमण कर इस स्थान पर इन तीन में से कोई भी एक पुस्तक रख सकते हैं। मुझे रखना होगा तो मैं ‘अजाने मेलों में’ को रखूंगा। यह पुस्तक एकालाप और सुख की प्रतीक्षा के असंख्य ढंग सिखाती है। 

***
...और आखिर मैं यह कहना आवश्यक है कि मैंने यह सब उस छात्र की तरह लिखा है जिसे सारे उत्तर पता होते हैं, लेकिन वक्त की कमी के चलते जो पर्चा पूरा कर नहीं पाता। 

***
[ ‘दि संडे पोस्ट’ में प्रकाशित ]
तस्वीर : Christine Ellger

Thursday, September 4, 2014

कहां नहीं है ‘बखेड़ापुर’



वर्तमान की चापलूसी में 
तुम कभी भी अपने अतीत को व्यर्थ नहीं समझोगे
सारी दुर्घटनाएं सींचेगी
हरे-हरे पात लाएंगी
आने वाली पीढ़ियां सदा उर्वरा होंगी भारत की 
[ कमलेश ] 


युवा कवि हरे प्रकाश उपाध्याय के उपन्यास ‘बखेड़ापुर’ का प्रत्येक अध्याय ज्ञात-अज्ञातकुलशील कवियों की काव्य-पंक्तियों के उद्धरणों के साथ आरंभ होता है। यह उपन्यास एक कवि का है इसलिए इसकी भाषा और प्रस्तुति को कुछ काव्यात्मक भी होना चाहिए... कवि इस दायित्व से प्रत्येक अध्याय से पहले दिए गए उद्धरणों के साथ मुक्त हो जाता है। ये उद्धरण उपन्यास की अंतर्वस्तु से असंपृक्त हैं। अपने कुल प्रभाव में ये उद्धरण केवल अध्याय का खत्म और शुरू होना सूचित करते हैं, वैसे ही जैसे इस उपन्यास पर लिए प्रस्तुत नोट्स में आए उद्धरण केवल एक अनुच्छेद का आना और जाना सूचित करते हैं। गद्य रच रहे एक कवि के लिए इस तरह एक कवियोचित दायित्व से मुक्त होना खेदजनक है। इस उपन्यास की भाषा और प्रस्तुति काव्यात्मक नहीं है। उद्धरण दूसरों के होते हैं, इसलिए उनसे आपका काम अंत तक नहीं चल सकता। 

वे कुछ नहीं करते
अपने आप प्रकट होता है उनसे
सुंदर और नश्वर 
[ ध्रुव शुक्ल ] 

भाषा और प्रस्तुति में औपन्यासिक काव्यात्मकता न होने के बावजूद यह उपन्यास आस्वाद के स्तर पर सशक्त है, और ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां कवि अपने लोक में गहरे उतरा हुआ है। यहां लोक से उठकर आए अपरिष्कृत शब्दों का अर्थपूर्ण वैभव है और लोक से ही उठकर चले आए अंधयकीनों का वैभववंचित दर्प भी। पात्रों (जिनका कम न होना वैसे ही है, जैसे उनका बहुत न होना) के छोटे-छोटे जीवन-प्रसंगों के बीच चलती किस्सागोई गजब है। यह किस्सागोई और यह लोक-वैभव हिंदी उपन्यास में एक अर्से बाद लौटा है, यह कहने की जरूरत नहीं कि इस अर्थ में यह उपन्यास स्वागतयोग्य है।

मैं यहीं कहीं की गलियों से बाहर निकलने की राह खोजता हूं
नक्षत्रों पर उसकी उंगलियों से छूटे निशानों से 
मेरी नियति का नक्शा तैयार होता है 
जिसमें उलझकर न जाने कितने निर्दोष गिरते चले जाते हैं 
[ उदयन वाजपेयी] 

‘बखेड़ापुर’ में अनपढ़ बनाए रखने की साजिशों के बीच भी बोलियां अपना उल्लास और चुटीलापन नहीं खोती हैं। काहिली और सतही मनोरंजन से घिरे पात्र हाशिए की वर्णनात्मकता रचते रहते हैं। जीवन में इतना विलाप, इतना व्यंग्य, इतना क्रोध, इतनी करुणा, इतनी विवशताएं होती हैं कि इसके प्रकटीकरण के लिए औपन्यासिक काव्यात्मकता को खोकर भदेस होना पड़ता है :

‘काका सुनाइए तनी, का हुआ सुहागरात के दिन?’
‘अरे दुर, तोहनियो सब न रोज एके बतिया करता है।’
‘काका बतिया तो एके नू है, रतिया के बतिया, कि दू ठो है, तो दूनो सुनाइए।’
‘पैर दबाएगा न रे तेलिया?’
‘आरे काका शुरू न करिए, तेली रामा रोज दबाते हैं, आज कोई नया है?’

यह उपन्यास अपने कथ्य में विषयों को अतिक्रमित करता हुआ चलता है।

हम आहत थे और रुग्ण थे और हर बात मन में 
रंग की तरह लगाकर बैठ जाते थे
अपने अंग-संग दिन-रात रहने वाले शख्स की 
याद आने लगती थी और रोना आता था
कोई बहुत दूर था, उसकी गंध रंध्रों में फूट पड़ती थी
और सफेद रात घिर आती थी
[ तेजी ग्रोवर ] 

यहां यथार्थ जैसे-जैसे खुलता है, वैसे-वैसे और फैलता जाता है। यह आश्चर्यजनक नहीं कि यह उपन्यास खत्म भी एक फैलाव पर होता है। यहां मुक्तिबोध याद आते हैं जिनके सामने एक कदम रखते ही हजार राहें फूटती हैं : 

‘भीतर से कोई आवाज नहीं आती। बाहर से आवाज लगाने वाला कसमसाकर रह जाता है।
जितने भी ‘गिद्ध’ हैं और बहुत सारे ‘गिद्ध’ हैं, सब नजर गड़ाए हुए हैं।’

सरकारी योजनाएं, शिक्षा, चिकित्सा, यौन-मनोविज्ञान, अंधविश्वास, जाति-व्यवस्था, आर्थिकी के बदहाल वर्तमान के बीच ‘बखेड़ापुर’ में वह सब कुछ जो बहुत जरूरी है, अनिश्चितकाल के लिए अवकाश पर है। अपने केंद्रीय कथ्य और प्रकाश में यह कथा एक ऐसी स्थानीयता जो कहीं भी हो सकती है, की बदहाली को राजनीति की बदहाली से और राजनीति की बदहाली को शिक्षा की बदहाली से जोड़ती है। घटनाक्रम, चरित्र और व्यवस्था बदलते रहते हैं, लेकिन यह बदलाव बदहाली को बदल नहीं पाता।

अंधे बिल में अजन्मे शिशु की पसली टूटती है 
तो ईश्वर की हिचकी में गर्दन गिरे पेड़ सी लटक जाती है  
[ अनिरुद्ध उमट ]

यहां सच टूट रहा है और इस टूटन में यह उपन्यास बार-बार स्कूल की तरफ लौटता रहता है, लेकिन यहां तक आते-आते वहां :

‘बखेड़ापुर में रामदुलारो देवी मध्य विद्यालय, पुलिस छावनी में तब्दील हो गया था। स्कूल अब अस्थायी तौर पर ही लगता। बच्चे बहुत कम स्कूल आ पाते, शिक्षक भी कम आते या नहीं आते— कौन पूछने वाला था।’ 

तमाम (अ) मानवीय धत्तकर्मों, गालियों, हिंसा के समानांतर उभरती प्रतिहिंसा के साथ ‘बखेड़ापुर’ की भाषा और प्रस्तुति सिनेमाई प्रभाव लिए हुए है। यहां औपन्यासिक काव्यात्मक वैभव न सही, लेकिन कहीं-कहीं एक ऐसी सांगीतिक लय है जो अपने असल असर में कुछ कचोटती हुई-सी है।

लकड़ीली दिल्लगी पर डेढ़ घड़ी दिन चढ़ा होता 
पर भाप छाया जैसे जमी रहती
दिन चिलका पड़ता फिर धूमिल धब्बे में बिखर जाता
[ पीयूष दईया ]  

‘बखेड़ापुर’ पढ़ चुकने के बाद हिंदी के सामयिक गद्य में औपन्यासिक काव्यात्मक वैभव की खोज नए सिरे से जारी होगी क्योंकि बकौल अखिलेश ‘बखेड़ापुर’ में जिंदगी भरपूर है और जिस जिंदगी की हरे प्रकाश ने जिस जरूरी तटस्थता और लेखकीय संलग्नता के साथ पुनर्रचना की है उसके कारण भी यह उपन्यास समकालीन सृजन संसार में समादृत होने का अधिकार हासिल करता है...’ 

निर्जन है, निस्पंद नहीं है 
अरण्य है तो आखेट तो होगा ही 
पैरों के नीचे तुम्हारा ही बिंब है 
अगले कदम पर कौन होगा तुम्हारे साथ
इसलिए अरण्य है तो आखेट तो होगा ही
[ शिरीष ढोबले ]

***
'बखेड़ापुर' पर यहां प्रस्तुत ये समीक्षापरक नोट्स ‘सदानीरा’ में शीघ्र प्रकाश्य 
युवा कवियों के उपन्यासों पर लिखे गए एक वृहत लेख से है

Monday, August 4, 2014

पैंतीस वर्ष कम नहीं होते बेवकूफियों के लिए


‘‘सूक्ष्म अंतर्दृष्टि। संयत कला। अनुशासन और आत्मीयता।’’ यह अशोक वाजपेयी का निर्णायक मत है। यह उन्होंने आज से करीब पैंतीस वर्ष पहले अरुण कमल को उनकी कविता उर्वर प्रदेश के लिए प्रथम भारत भूषण अग्रवाल स्मृति युवा कविता पुरस्कार से नवाजते हुए दिया था।

‘‘बिलकुल अप्रत्याशित मुहावरे। समय का आख्यान। गहन इतिहासबोध। आवृत मार्मिकता। जटिल अनुभव और स्थितियों का समाहार।’’ यह अरुण कमल का निर्णायक मत है। यह उन्होंने करीब पच्चीस दिन पहले आस्तीक वाजपेयी को पैंतीसवें भारत भूषण अग्रवाल स्मृति कविता पुरस्कार से नवाजते हुए दिया। 

भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार अशोक वाजपेयी के घर का पुरस्कार है और आस्तीक वाजपेयी अशोक वाजपेयी के घर के हैं। भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के सारे निर्णायक अशोक वाजपेयी-ग्रुप के हैं या उनसे असहमत हो पाने की क्षमता के बाहर के...। आस्तीक वाजपेयी की कविताएं ‘समास’, ‘पूर्वग्रह’ और ‘सदानीरा’ जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। आस्तीक बहुत खराब कविताएं लिखते हैं। अशोक वाजपेयी वाम-विरोधी हैं। अरुण कमल ‘वामपंथी’ हैं। भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार समारोह का आयोजन पांच वर्ष में एक बार होता है। गए पैंतीस वर्षों में भारत ने कई मध्यावधि चुनाव देखे हैं, लेकिन भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार ने एक भी मध्यावधि आयोजन नहीं देखा। यहां आकर अब मुझे इन छोटे-छोटे वाक्यों से कुछ बड़े वाक्यों की ओर बढ़ना चाहिए...।

तीन अगस्त 2014, रविवार की शाम भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार समारोह का आयोजन नई दिल्ली के तानसेन मार्ग पर स्थित त्रिवेणी सभागार में हुआ। पुरस्कृत कवि : व्योमेश शुक्ल (2010), अनुज लुगुन (2011), कुमार अनुपम (2012), प्रांजल धर (2013), आस्तीक वाजपेयी (2014) मंचासीन निर्णायक : उदय प्रकाश, अनामिका। अध्यक्ष : केदारनाथ सिंह। संचालन : अशोक वाजपेयी। संयोजक : अन्विता अब्बी।

इस तथ्य को प्रतिवर्ष एक दिन और पांचवें वर्ष में दो दिन बहुत गहराई से महसूस किया जाता है कि अगर भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार न होता तो भारत भूषण अग्रवाल का क्या होता। यकीनन उन्हें वैसे ही भुला दिया गया होता जैसे ‘तार सप्तक’ के बहुत सारे कवियों को...। वक्त बहुत वक्त तक प्रभावहीनता को बर्दाश्त नहीं करता। लेकिन ‘स्मृति-उपक्रम’ कुछ भी संभव कर सकते हैं। नवीनतम उपक्रम की शुरुआत बहुत भद्दी रही। भारती शर्मा के निर्देशन में रंग-संस्था ‘क्षितिज’ द्वारा दी गई भारतभूषण अग्रवाल की कविताओं की नाट्य-प्रस्तुति में न नाट्य था, न प्रस्तुति। ‘मांसल’ को मासल और ‘रुचि’ को रूची पढ़ते अभिनय या कहें पाठ ने भारत भूषण अग्रवाल की कविताओं के प्रति बहुत घृणा उत्पन्न की। उनके सड़े हुए तुक्तकों की दुर्गंध तब और मुखर हो गई जब इस रंग-समूह ने दर्शकों को चौंकाने के लिए अपना आखिरी या कहें एकमात्र दांव खेला। इन तुक्तकों को ‘रैप’ करके कलाकारों या कहें विदूषकों ने सभागार में अरुण कमल की तरह ही नामौजूद यो यो हनी सिंह की कमी को भर दिया। तकरीबन पैंतीस मिनट लंबी इस यातना के बाद अन्विता अब्बी ने कविता-प्रस्तुति के संदर्भ में हुई इस ‘आधुनिक पहल’ को सराहते हुए भारती शर्मा का आभार प्रकट किया और विषयांतर करते हुए कहा कि अरुण कमल पटना से रवाना तो हुए थे, लेकिन पता नहीं दिल्ली क्यों नहीं पहुंचे...।

इसके बाद जब संयोजक द्वारा मंचस्थ होने के लिए अध्यक्ष, निर्णायकों और संचालक को आमंत्रित किया गया तो केदारनाथ सिंह केंद्र ढूंढ़ने लगे, अशोक वाजपेयी ने उन्हें केंद्र बताया तब वह उदय प्रकाश के बगल में बैठे जो तब तक अनामिका के बगल में बैठ चुके थे। केदारनाथ सिंह का इस तरह बैठना अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश के बीच में बैठना था। उनका इस तरह बैठना अनामिका से कुछ दूर बैठना था।

‘‘अब तक पैंतीस कवियों को यह पुरस्कार मिल चुका है। यह प्रतिवर्ष प्रकाशित एक श्रेष्ठ कविता पर दिया जाता है, सर्वश्रेष्ठ कविता पर नहीं।’’ यह कहते हुए अशोक वाजपेयी माइक पर थे। उन्होंने युवा कवियों का आत्मविश्वास तोड़ने वाले कुछ अर्थवंचित वाक्य कहे। इन वाक्यों का प्रसार और न बढ़े इस दृष्टि से मैं इन्हें यहां उद्धृत नहीं कर रहा हूं। उन्होंने इस बात को बहुत शान से शाया किया कि इस पुरस्कार की ज्यूरी और प्रक्रिया सार्वजानिक है। उन्होंने कहा कि हिंदी के बहुत सारे पुरस्कारों पर एक अजब किस्म की गोपनीयता का आतंक हावी है। अशोक वाजपेयी की बातों और कार्यकलापों पर उनकी उम्र का असर अब साफ दिखने लगा है। यह कहते हुए कि आज आपको पांच कवियों को पुरस्कृत होते हुए देखने का ऐतिहासिक सौभाग्य मिलेगा, उन्होंने व्योमेश शुक्ल का परिचय और उनकी कविता ‘बहुत सारे संघर्ष स्थानीय रह जाते हैं’ पर स्वरचित निर्णायक मत पढ़ा। व्योमेश शुक्ल से जुड़े अपने फैसलों पर उनका कहना था कि उन्हें इन पर कोई संकोच नहीं है।

व्योमेश शुक्ल ने पुरस्कृत कविता और ‘जस्ट टियर्स’ शीर्षक एक लंबी कविता पढ़ी। इस कविता का आखिरी वाक्य, ‘तब से मैंने कुछ नहीं कहा है’ पढ़ने के बाद वह श्रोताओं को स्तब्ध और इस इंतजार में छोड़ कि वह अगला वाक्य कब कहेंगे, अपने स्थान पर लौट गए।

अशोक वाजपेयी द्वारा अनुज लुगुन का पुराना परिचय पढ़ने के बाद, ‘‘कविता में होना और हिंदी कविता में होना बहुत मुश्किल है’’— यह कहते हुए उदय प्रकाश ने अपनी लटपटाती जुबान में अनुज लुगुन की कविता ‘अघोषित उलगुलान’ पर अपना निर्णायक मत पढ़ा। कभी उदय प्रकाश के पास एक और भाषा हुआ करती थी जिसमें अविनाश दास का जिक्र नहीं हुआ करता था। जिसमें पैतीस साल के पूरे हो रहे कवि उन्हें कॉल करके भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार देने के लिए डिस्टर्ब नहीं करते थे। यहां असद जैदी की कविता-पंक्तियां याद आती हैं कि ‘परिस्थितियां खराब हैं/ परिस्थितियां बहुत अच्छी तरह खराब हैं।’

अनुज लुगुन ने जोहार किया। उन्होंने पतलून और सैंडिल बहुत अच्छे पहन रखे थे। उन्होंने पुरस्कृत कविता और ‘चिड़ियाघर में जेब्रा की मौत’ शीर्षक कविता पढ़ी। इस पाठ में कुछ बुराइयां खासकर लक्षित की गईं, इनमें प्रमुख थी— ‘हिंदी विभागीय ट्रेनिंग’।

इस आयोजन में यह देखना भी ‘ऐतिहासिक सौभाग्य’ के अंतर्गत था कि अनुज लुगुन की कविता पर अनामिका ने जमुहाई ली। यह जमुहाई अनामिका की आवाज की तरह ही आकर्षक थी। और क्यों न हो जब वह भी उनके होंठ खुलने पर ही बाहर आती है। वैसे यह देखना भी ‘ऐतिहासिक सौभाग्य’ के अंतर्गत ही था कि जब परिचय और निर्णायक मत पढ़ा जा रहा होता तब पुरस्कृत कवि कागज के एक टुकड़े की प्रतीक्षा में मंच के एक कोने में सिर झुकाए खड़ा रहता। यह तब और भी मूर्खतापूर्ण रहा जब इस दफा इस कागज के टुकड़े पर पांच में से तीन निर्णायकों के ही हस्ताक्षर हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल बल्गारिया में हैं और अरुण कमल पता नहीं कहां हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल बल्गारिया में हैं, यह पता नहीं चलता अगर सभागार के एक कोने से सुमन केशरी और दूसरे से अजित राय इस बात को चिल्लाकर न बताते।

अशोक वाजपेयी के यह कहने के बाद, ‘‘कुमार अनुपम का परिचय बहुत बड़ा है, इसे क्या बताया जाए आप सब जानते ही होंगे...’’ अनामिका माइक पर थीं। उन्होंने कुमार अनुपम की कविता कुछ न समझे खुदा करे कोई’ पर अपने निर्णायक मत में क्या पढ़ा, मैं कुछ भी सुन नहीं पाया। अनामिका जब भी कुछ बोलती हैं, मैं सुन नहीं पाता। उनकी आवाज अपने सौंदर्य में खो जाने के लिए मुझे बाध्य करती है, मैं कई बार खो चुका हूं। जब तक कोई दूसरी आवाज नहीं आती, मैं खोया रहता हूं। मैं इसे सार्वजनिक रूप से कहना चाहता हूं कि मैं कभी आमने-सामने बैठकर अनामिका का इंटरव्यू नहीं कर पाऊंगा। देह-भाषा और वाणी की अद्भुत मधुरता के सघन सामंजस्य में मैं अपने मूल लक्ष्य से वैसे ही भटक जाऊंगा जैसे इस रपटनुमा आलेख में...।

कुमार अनुपम ने पुरस्कृत लंबी कविता के कुछ अंश और एक या शायद दो छोटी कविताएं पढ़ीं। वह प्रकाशक अशोक आजमी और समन्वय-संयोजक गिरिराज किराडू को मिस कर रहे हैं, ऐसा उनकी आवाज से साफ लग रहा था। छिट-पुट या कहें पिट-पुट तालियों के बीच वह जहां से उठे थे वहीं बैठ गए।

अशोक वाजपेयी ने प्रांजल धर का परिचय और उनकी कविता ‘कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं’ पर पुरुषोत्तम अग्रवाल रचित निर्णायक मत पढ़ा। प्रांजल धर ने पुरस्कृत कविता और दो अन्य कविताएं पढ़ने का अभिनय किया। खराब कविताएं अच्छी तरह से कैसे पढ़ी जाती हैं, यह तकनीक युवा कवियों के साथ-साथ कई वरिष्ठ कवियों को भी प्रांजल धर से सीखनी चाहिए।

‘आस्तीक वाजपेयी अट्ठाइस  साल के हैं और उन्हें जानकी-‘पूल’ सम्मान भी मिल चुका है।’ इस ‘जरूरी जानकारी’ से भरा परिचय पढ़ने के बाद अशोक वाजपेयी को शर्म आने लगी, इसलिए अन्विता अब्बी ने अरुण कमल रचित और अशोक वाजपेयी द्वारा प्रायोजित  आस्तीक वाजपेयी की कविता ‘विध्वंस की शताब्दी’ पर निर्णायक मत पढ़ा। मैं चाहता हूं कि इस कविता पर मेरा भी मत पढ़ा जाए— ‘‘असंतुलित स्फीति। रूढ़ भाषा। बासी बिंब। पुरातन कथ्य। पूर्ववर्ती कवियों की खराब नकल और ऊब की पराकाष्ठा।’’ 

‘‘अशोक जी गलत कह रहे हैं, मैं अट्ठाइस नहीं सत्ताईस साल का हूं। यह बात कम से कम उन्हें तो नहीं ही भूलनी चाहिए क्योंकि मैं पैदा होकर उनके ही घर गया था।’’ ‘आस्तीकलीक्स’ के इस खुलासे के बाद जैसे कोई बटन दब गई हो और उसमें से पुरस्कृत कविता और ‘भाषा’ व ‘नक्षत्र’ शीर्षक दो छोटी कविताएं बाहर आई हों। अ आ इ ई उ ऊ भा भा भू भू थू थू... आस्तीक वाजपेयी अभी सीख रहे हैं। यह अमर वाक्य जैसे उनके लिए ही है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती... अ आ इ ई उ ऊ भा भा भू भू थू थू...।

केदारनाथ सिंह जब अशोक वाजपेयी के कानों के पास अपने होंठ ले गए तब मुझे लगा कि शायद वह कह रहे हैं कि आपके घर में एक ‘जीनियस’ पैदा हो गया है। इसके बाद अशोक वाजपेयी ने वक्तव्य पर नहीं संक्षेप पर जोर देते हुए केदारनाथ सिंह को माइक पर आमंत्रित किया और केदारनाथ सिंह ने अपना अमूल मक्खन टाइप वक्तव्य दिया। इसमें उन्होंने दो बार भारत भूषण अग्रवाल की स्मृति को नमन किया और इतनी ही बार अन्विता अब्बी की उपस्थिति को धन्यवाद दिया। भारत भूषण अग्रवाल का मित्र होने से इंकार करते हुए उन्होंने उनसे जुड़ा एक बोरिंग संस्मरण सुनाया। अब बारी थी एक बड़े खुलासे की। केदारनाथ सिंह ने कहा, ‘‘मैंने इस पुरस्कार से पांच नहीं छह कवियों को पुरस्कृत किया है। वह इस तरह कि मैंने अनुज लुगुन की नियुक्ति एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में केवल इसलिए होने दी क्योंकि इस कवि को भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिल चुका था।’’ अंत में उन्होंने कहा कि पैंतीस वर्षों में हिंदी कविता ‘अ’ (अरुण कमल) से ‘आ’ (आस्तीक वाजपेयी) तक की ‘लंबी’ यात्रा कर चुकी है।

अशोक वाजपेयी ने यह कहते हुए कि एक समय कोई भी भारत भूषण अग्रवाल का मित्र हो सकता था, उनसे जुड़ा एक भूल जाने लायक संस्मरण सुनाया। उन्होंने यह भी कहा कि शाम काफी लंबी हो चुकी है। सभागार के बाहर आकर मैंने भी इस बात को महसूस किया कि अंधेरा काफी घना हो चुका था। अभी सफर बहुत था और आधी रात बीतने पर बारिश होनी थी। 
***

हिंदी कविता के लिए यह सचमुच एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन था। खराब कविता का इतना सम्मान। उसे इतना महत्वपूर्ण मंच, इतना स्थान। ऐसी बेहूदा बयानबाजी। यह बताता है कि अब हिंदी पट्टी में कहीं कोई हाशिए पर नहीं है— न दलित, न स्त्री, न अल्पसंख्यक, न आदिवासी... आज हाशिए पर है सिर्फ सच्ची हिंदी कविता। कवियों के पास बढ़िया कुर्ते, बढ़िया जींस, बढ़िया चश्मे, बढ़िया घड़ियां, बढ़िया स्मार्टफोन और बढ़िया जूते हैं, लेकिन सुनाने लायक कविताएं नहीं हैं, न ही सुनाने का शऊर। मैं महज शाब्दिक निष्कर्षों पर यकीन नहीं करता, लेकिन कहना चाहता हूं कि हिंदी में प्रचलित और पुरस्कृत निकृष्ट कविता के प्रतिपक्ष में हमें अपनी काव्यात्मक चिंताएं और गतिविधियां बढ़ानी होंगी। यह कोई नई और अनूठी बात नहीं है, लेकिन इसे बराबर दोहराते और अमल में लेते रहने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। संभवत: ऐसा करके ही हिंदी में परवान चढ़ते कुछ वरिष्ठों के भ्रष्ट कारनामों से बचा जा सकता है। भारत भूषण अग्रवाल स्मृति कविता पुरस्कार के निर्णायक सर्वश्री अशोक वाजपेयी, अरुण कमल, उदय प्रकाश, पुरुषोत्तम अग्रवाल और अनामिका नई बनती हिंदी कविता को अवसादग्रस्त कर कुचलने की पूरी तैयारी में हैं। इन सबकी समझ और व्यवहार साहित्यिक राजनीति से संचालित और गठजोड़ से प्रेरित है। इनके अब तक के फैसलों ने हिंदी में अयोग्यों को स्थापित कर इसके लिए बाध्य किया है कि हिंदी में गैरजरूरी बहसें पनपें। अब हिंदी में असल युवा कवि वही होगा जो इन्हें बेईमान मानकर चलेगा। इसके अतिरिक्त भी उन तमाम समितियों-संस्थाओं-अकादमियों —जो पैतीस वर्ष से कम के रचनाकारों को पुरस्कृत करती हैं— के दृश्य-अदृश्य निर्णायकों को भी हिंदी के वास्तविक युवा कवियों को बेईमान मानकर चलना होगा...।