Saturday, April 5, 2014

सारा सुर ही दूसरा लग गया...

16वें लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी की लहर हो या न हो, लेकिन हिंदी के प्रगतिशील व्यक्तित्वों में इससे बावस्ता खौफ बहुत है। यह कुछ जाहिर हुआ कल नई दिल्ली के साहित्य अकादमी सभागार में आयोजित देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह के मौके पर। जैसे सारे समारोह शुरू होते हैं वैसे ही यह समारोह भी जलपान और दर्शन-प्रदर्शन के साथ-साथ मंच पर से आती संचालकीय वाणी से शुरू हुआ। संचालिका अल्पना मिश्र ने अपनी मधुर आवाज में जरूरी औपचारिकताओं की अदायगी करते हुए 18वें देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार से सम्मानित विनोद तिवारी को प्रखर आलोचक बताते हुए कहा कि वह युवा रचनाशीलता को रेखांकित भी करते हैं। यह बात संचालिका को इसलिए भी याद आई क्योंकि ‘पक्षधर’ में एक बार विनोद तिवारी ने उन्हें छापा था।

राजेंद्र यादव की स्मृति में एक मिनट के मौन के बाद अर्चना वर्मा ने— इस बार के निर्णायक अजित कुमार, नित्यानंद तिवारी, अशोक वाजपेयी और वह स्वयं थीं यह जानकारी देते हुए— प्रशस्ति-वाचन किया। इस दरमियान विनोद तिवारी का मुखमंडल वैसा ही था जैसा ऐसे अवसरों पर प्रशस्ति-पत्र के नायक-नायिकाओं का एक अनिवार्य विकल्पहीनता में हो जाया करता है। इसके बाद उन्हें स्मृति-चिन्ह और अन्य वस्तुएं प्रदान की गईं जिन्हें देते हुए इस समारोह के अध्यक्ष मैनेजर पांडेय ने विनोद तिवारी से कहा, ‘अपनी ओर ज्यादा रखो वर्ना लोग समझेंगे सम्मान मुझे मिल रहा है।’

विनोद तिवारी ने ‘आलोचना : एक सजग आलोचनात्मक कार्रवाई’ शीर्षक आत्म-वक्तव्य में कहा, ‘आलोचना एक रचनात्मक क्रिया है।’ इसके लिए उन्होंने शिवदान सिंह चौहान को उद्धृत किया। ‘नथिंग इज फाइनल’ यह बताते हुए उन्होंने लेनिन को उद्धृत किया। कुछ सुनी-सुनी और सूनी-सूनी बातों के बीच उन्होंने मुक्तिबोध को भी उद्धृत किया। युवा आलोचना ने साहित्य से अपने रिश्ते को गंभीर बनाया है यह सिद्ध करने के लिए उन्होंने विजयदेव नारायण साही को उद्धृत किया। मनचाही स्वायत्तता के संदर्भ में उन्होंने राजशेखर को उद्धृत किया। उन्होंने अपने ज्ञान से आतंकित करने की बहुत कोशिश की, लेकिन कर नहीं पाए क्योंकि उन्होंने स्पेंसर, एडोर्नो, हेबरमास, अल्थ्युसे, इगल्टन, जेमेसन, फूको, देरिदा, सोंटैग, बाख्तिन, बोद्रिला वगैरह को उद्धृत नहीं किया। ‘आलोचना के पक्ष में बोलना खुद को संदेहास्पद करना होता है’ एक अज्ञात कवि के इस ज्ञात वाक्य को उद्धृत करते हुए उन्होंने इकबाल का ‘परवाज में कोताही’ वाला शे’र उद्धृत किया और अपना पर्चा अधूरा छोड़ अपने स्थान पर लौट गए।

बाद इसके शाश्वती बिटिया ने अपने नाना (देवीशंकर अवस्थी) के लिखे एक लेख का अंश पढ़ा।

अब महफिल सुनने लायक हो चली थी, कवि असद जैदी माइक पर थे। उन्होंने कहा कि वह न पहुंचने के लिए बदनाम हैं, लेकिन आज उन्हें आना पड़ा और आते हुए उन्हें जिगर मुरादाबादी का यह शे’र बहुत याद आ रहा था कि ‘करना है आज हजरत-ए-नासेह का सामना/ मिल जाए दो घड़ी को तुम्हारी नजर मुझे।’ यहां आकर जब उन्होंने डॉक साब (मैनेजर पांडेय) को देखा तो उन्हें इस शे’र के याद आने की वजह समझ में आ गई। उन्होंने कहा, ‘आज ‘आलोचना के सरोकार’ विषय पर यह संगोष्ठी एक ऐसे समय में हो रही है जब एक फासिस्ट की ताजपोशी बस कुछ ही दिन दूर है। यह एक गंभीर क्षण है और यह अचानक उपस्थित नहीं हो गया है। इसकी तैयारी बहुत दिन से हो रही थी। आधुनिक भारत के इतिहास का यह एक स्थगित क्षण है जो अब हमारे सामने आ गया है। यह बात इस मौके पर प्रासंगिक नहीं है, लेकिन कोई और बात मेरे दिमाग में नहीं आ रही है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘हिंदी आलोचकों से मैं बहुत बोर होता हूं। उनकी भाषा बहुत लद्धड़ है। वे इसे बहुत कामचलाऊ ढंग से इस्तेमाल करते हैं और बस घास काटते हुए चले जाते हैं। हिंदी एक अकेली जुबान है जहां आलोचना को एक समुदाय की तरह देखा जाता है।’ विश्वविद्यालयों में चलने वाली शोध-प्रतिशोध की कार्रवाइयों को निशाने पर लेते हुए उन्होंने कहा, ‘हिंदी में प्राध्यापक बनते ही आप आलोचक मान लिए जाते हैं। हिंदी का प्राध्यापक सिर्फ खुद के प्रति जवाबदेह है।’ इन प्राध्यापकीय अजाब से निकलने को उन्होंने भविष्य की हिंदी आलोचना का सबसे जरूरी काम बताया।      

‘बहसों को ही आगे बढ़ाऊं या कुछ और...’ यह कहते हुए प्रणय कृष्ण ने माइक संभाला और असद जैदी ने इजाजत चाही। असद जैदी की अनुपस्थिति और शेष उपस्थिति को संबोधित प्रणय कृष्ण ने कहा, ‘आलोचना के बगैर परिवर्तन नहीं होता।’ उन्होंने हिंदी में चल रही तमाम बहसों, विमर्शों और सांप्रदायिक राजनीति के उभार... आदि के अंधकार में अपनी बात रखते हुए कहा, ‘केवल दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र पर चल रही बहसों को छोड़ दें तो हिंदी में कोई साहित्यिक बहस नहीं है।’ प्रणय कृष्ण का वक्तव्य अपने कुल असर में बहुत विरोधाभासी और ‘नथिंग इज फाइनल’ वाले मूड का रहा। अंत में उन्होंने माफी मांगते हुए कहा, ‘आलोचना मौलिकता की भ्रांत धारणा का अतिक्रमण करती है।’

‘मैं कुछ सनसनीखेज बातें करूंगा’ ऐसे बाजारू वाक्य से अपना वक्तव्य शुरू करते हुए संजीव कुमार ने कहा, ‘हम इस संगोष्ठी के विषय के फ्रेम में उलझ गए हैं। ‘आलोचना और सरोकार’ में आलोचना और सरोकार दोनों के साथ ही कोई विशेषण नहीं है। यह बात वक्ता को आजादी देती है।’ इस आजादी का पूरा फायदा उठाते हुए संजीव ने पूर्व-वक्ता असद जैदी की बातों से सहमति व्यक्त की और कहा, ‘आलोचना एक शक्ति का खेल है जो तर्कों और मानदंडों के बल पर चलती है। इसमें ही सरोकारों का प्रश्न आता है।’ पिरामिडीय ऊंचाई, गिरने-गिराने का डर, स्पेस और सनसनी इत्यादि से गुजरते हुए संजीव इस नतीजे पर पहुंचे कि आलोचना का समस्याग्रस्त होना उसके तेज को छीन रहा है। कैथरीन बेल्सी को उद्धृत करते हुए उन्होंने फरमाया, ‘जब हम एक साहित्यिक कृति के प्रोडक्शन प्रोसेस को भुलाकर उसे सृजन का नाम देते हैं तो यह एक रहस्यावरण होता है जिसकी कोई भौतिक व्याख्या नहीं हो सकती।’

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए मैनेजर पांडेय ने कहा, ‘अध्यापकों के बहुत सारे दोष हैं। इनमें से एक दोष यह भी है कि उन्हें विषय पर कुछ कहना पड़ता है।’ यह कहते हुए कि ‘आलोचना लोक-लोचन है’ मैनेजर साहब ने संगोष्ठी की गंभीरता किंचित कम की। उन्होंने महज पंद्रह मिनट में आलोचना के सारे सरोकार एक-एक करके बताए। वे कैसे बदल गए हैं, वे कैसे बदल रहे हैं, उनकी स्थानीयता और उनका भूगोल... सब कुछ मैनेजर पांडेय ने अपनी चिरपरिचित आवाज में बयान किया। उन्होंने कहा, ‘रामचंद्र शुक्ल को बहुत लतियाया गया है। उन्होंने बहुत अपराध किया जो कुछ पढ़ा-लिखा। लेकिन फिर भी इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता कि जो उन्होंने सोचा उसे पूरे साहस के साथ कहा। खाली हाथ में लोटा-गिलास लेकर रस की खोज करने से आलोचना का काम नहीं चलता।’ उन्होंने भी असद जैदी से अपनी सहमति व्यक्त करते हुए कहा, ‘आलोचना की भाषा पर ध्यान देना सचमुच बहुत जरूरी है। बही की भाषा में आलोचना नहीं लिखी जाती। भाषा सोच की शैली को प्रतिबिंबित करती है।’ आलोचना-भाषा के संदर्भ में अपनी बात आगे बढ़ाते हुए मैनेजर साहब ने आखिर में एक बहुत ही हल्की बात कर दी। उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि विनोद तिवारी रामविलास शर्मा से ज्यादा अच्छी अंग्रेजी जानता है, लेकिन फिर भी इसने अपने पांच पेज के पर्चे में पच्चीस अंग्रेजी शब्द इस्तेमाल किए जबकि रामविलास शर्मा ने 500 पेज की किताब लिखते हुए भी पांच से ज्यादा अंग्रेजी शब्द कभी इस्तेमाल नहीं किए।’

अंत में अनुराग अवस्थी ने धन्यवाद ज्ञापन किया, फिर पता नहीं क्या हुआ...।  



[तस्वीर : हिंदी साहित्य के ऑफिसियल फोटोग्राफर भरत तिवारी के कमरे से सॉरी कैमरे से...]         

Saturday, March 1, 2014

युवा हस्ताक्षर, पहली उड़ान और इसके बाद

...यह रिपोर्टिंग मैंने आज ही की तारीख में गत वर्ष की थी। इसमें इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि यह किसी दैनिक अखबार या किसी पत्रिका में प्रकाशित हो सके। इसके लिए इसकी सही जगह थी इंटरनेट, जहां यह प्रकाशित होने के बाद प्रशंसित और विवादित हुई। यह 'जानकीपुल' पर आई और तमाम प्रतिपक्षों और स्पष्टीकरणों के बावजूद अपनी हत्या से पहले एक सप्ताह तक सबसे पॉपुलर पोस्ट बनी रही। हिंदी साहित्य के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह के एक पत्र की वजह से इसके 'जानकीपुल' से हट जाने के बाद मैंने इसे अपने फेसबुक नोट के रूप में बचा लिया। आज इसकी बरसी पर इसे उस स्पष्टीकरण के साथ यहां प्रस्तुत कर रहा हूं, ताकि सनद रहे…। हालांकि तब से अब तक काफी साहित्य-जल बह चुका है। इस बहाव ने इस रिपोर्टिंग को कम से कम मेरे लिए और ज्यादा जरूरी बना दिया है। यह बहाव न भी होता तब भी व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए इस रिपोर्टिंग का बड़ा महत्व है। मैं 'प्रिकॉसिटी' की कद्र करता हूं और वह इस रिपोर्टिंग में है। मैंने साहित्य में साहित्येतर दबावों और दुरभिसंधियों को इसके बाद बहुत गहराई से समझा और अनुभव किया। मैंने ऐसी लातें देखीं जो मेरे पेट पर लगने वाली थीं, मैंने उन्हें मरोड़ दिया और उनके व्यक्तित्व के लूलेपन पर हंसा। मुझे समझ में आ गया कि हिंदी साहित्य के वर्तमान पर अब गंभीर और सृमद्ध भाषा में बेफिक्र होकर हंसे जाने की जरूरत है। मुझे लगा कि मेरे पास केवल एक और एकमात्र यही विकल्प है कि मैं इनके विमर्श, इनके मुहावरों और इनकी भाषा को नकार दूं। दिल दुखाना हमेशा दुखी करता है, मैं यह काम क्यों करूंगा, जबकि मेरे पास खुद एक टूटा हुआ दिल है। लेकिन आपके शब्द आपकी पवित्रता, सच्चाई और ईमानदारी को जाहिर कर देते हैं। भाषाई कहन ने झूठों को कभी पर्याप्त अवसर नहीं दिए। उनके कुकृत्य उनकी कहन से पहले ही उनके चेहरों पर नुमायां हो गए। मैं आक्रोश को अवसाद में बदलने का हुनर जानता हूं, लेकिन मैंने ऐसा कभी किया नहीं , ऐसा इसलिए हुआ क्यूंकि हरदम मुझे पता था कि मैं अकेला नहीं हूं, मैं वह कह रहा हूं, जो कई लोग कहना चाहते हैं, लेकिन चाहकर भी कह नहीं पाते।   

[ अ. मि.]

'ट्रिगर' दबाना बहुत आसान है, लेकिन जरूरी नहीं कि हर बार सामने वाला मरेगा या घायल ही होगा और तब तो और भी नहीं जब आपके हाथ भी कांपते हों। 'जानकीपुल' पर गए शनिवार (2 मार्च 2013) आई मेरी रिपोर्टिंग अब वहां मौजूद नहीं है। कई दबावों और दुरभिसंधियों के बीच वह वहां से हटा दी गई। फिलहाल अब यह मेरे फेसबुक नोट के रूप में सुरक्षित है और जो इसे अब तक नहीं पढ़ पाए हैं, वे अब इसे वहां पढ़ सकते हैं। और अंत में इनसे डरने की कोई जरूरत नहीं है क्यूंकि वे ताकतवर जरूर हैं, लेकिन इस बात से अब भी डरते हैं कि सारे कमजोर लोग एक दिन उनसे डरना छोड़ देंगे।



समय : 1 मार्च 2013, शुक्रवार की शाम।
स्थान : नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटाट सेंटर के बेसमेंट में अमलतास ऑडीटोरियम
विषय : युवा लेखिका ज्योति कुमारी के वाणी प्रकाशन से प्रकाशित कहानी संग्रह ‘दस्तखत और अन्य कहानियां’ का ‘पुन: विमोचन’ और इस बहाने ‘युवा हस्ताक्षर : पहली उड़ान’ पर परिचर्चा (परीचर्चा नहीं)।
संचालन : मज्कूर आलम
वक्ता : विभास वर्मा, रमणिका गुप्ता, संजीव कुमार, जयंती रंगनाथन।
अध्यक्ष द्वय : राजेंद्र यादव और नामवर सिंह।

दृश्य : मज्कूर आलम के अनाड़ी संचालन ने जब इस कार्यक्रम के सब वक्ताओं और अध्यक्षों को मंच पर अवतरित कर दिया, तब राजेंद्र जी ने संचालक महोदय से कहा, 'लेखिका कहां है??'
इसके बाद जब ज्योति कुमारी, विभास वर्मा के बगल में जाकर बैठ गईं तब विभास वर्मा उठकर माइक पर आए और कहा कि हिंदी साहित्य में इस तरह युवा लेखन को तवज्जो पहले कभी नहीं मिली। उन्होंने कहा कि आज युवा लेखन में कहानी विधा का दखल बहुत ज्यादा है। जहां एक तरफ तमाम नए लेखक उभरकर आ रहे हैं, वहीँ महानगरीय जरूरतों के हिसाब से खुद को नहीं ढाल पाने वाले कई युवा पीछे भी छूट रहे हैं।

रमणिका गुप्ता ने कहा कि उन्होंने एक कहानी छोड़कर ज्योति की सारी कहानियां पढ़ी हैं। हालांकि कहानियों के शीर्षक उन्हें ठीक से याद नहीं आ रहे थे, लेकिन किताब उन्होंने ठीक से और पूरी पढ़ी है (एक कहानी छोड़कर) यह जताने के लिए उन्होंने प्रकाशक अरुण महेश्वरी का ध्यान इस ओर दिलाया कि इस किताब में ‘कहां’ की जगह कई जगह ‘कहा’ छप गया है। कुछ अंतर्कथाओं और विवादों के चलते महज तीन दिनों के अंदर छापी गई इस किताब में मौजूद गलतियों के लिए न प्रकाशक दोषी है और न ही लेखिका, सारा दोष उस बेचारे प्रूफरीडर का है, जो पता नहीं इस मौके पर मौजूद था या नहीं। बहरहाल ‘एनी हाऊ’ और ‘डिफर’ जैसे शब्दों का बार-बार प्रयोग करते और मंचासीन लोगों की तरफ बार-बार देखते हुए रमणिका जी ने क्रमवार ढंग से ज्योति की कहानियों में क्या है, यह समझाया और इसके बाद वे इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए पलायन कर गईं, जहां अमेरिका से आ रहे अपने बेटे को उन्हें रिसीव करना था।

इसके बाद नामवर जी संचालक पर थोड़ा-सा लाउड हुए और इसके बाद शेष वक्ताओं के बोलने के लिए 10-10 मिनट निर्धारित हुए और इसके बाद ‘आज भरी महफिल में कोई बदनाम होगा...’ के इरादे से अपने हिस्से की बात शुरू करते हुए युवा आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि बहुत तरक्कीपसंद महफिलों में मैं रूपवादी हो जाने की तलब रखता हूं। बेहद गर्मजोशी और शानदार ढंग से अपनी बात रखते हुए संजीव ने आगे कहा कि साहित्य कोई डेटा नहीं है, हमें साहित्य और गजेटियर में फर्क करना आना चाहिए। उन्होंने नामवर सिंह और राजेंद्र यादव दोनों को निशाने पर लेते हुए कहा कि इन दोनों को अपनी-अपनी भूमिका में ज्योति की कहानियों की बड़ी कमियों की बात न करने के लिए कभी माफ नहीं किया जाएगा। यह कहने के बाद उन्होंने न्यू क्रिटिसिज्म के ट्रिक्स एंड टूल्स अपनाते और आजमाते हुए एक ‘डिटेक्टिव रीडर’ की तरह ज्योति की कहानियों की बड़ी कमियों को सार्वजनिक कर दिया। इन कहानियों के अंतर्पाठ में उतरते हुए उन्होंने कहा कि इनमें कोई 'कोहरेंट मैसेज' नहीं है और न ही ये अपने परिवेश, वार्तालाप और अंत से अपने पाठक को  कन्विंस कर पाती हैं। अंत में संजीव ने कहा कि उन्होंने उस डॉन को पकड़ लिया, जिसे पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है, यह अलग बात है कि डॉन जेल तोड़कर भाग भी सकता है।

परिचर्चा (परीचर्चा नहीं) में आई यह गर्मजोशी कुछ और बढ़ पाती इससे पहले ही जयंती रंगनाथन ने बिलकुल...बिलकुल...बिलकुल...बिलकुल... कह-कहकर महफिल ‘बिलकुल’ खराब कर दी। इसमें उनकी कोई गलती नहीं क्योंकि बकौल उनके ही जैसे हम हर ‘शरीफ लड़की’ से यह उम्मीद नहीं करते कि वह कंप्रोमाइज करेगी ही, वैसे ही हम हर वक्ता से यह उम्मीद नहीं करते कि वह संजीव कुमार की तरह ही बोलेगा।

मंचासीन ‘सरों’ और मैडमों और सीनियरों का शुक्रिया अदा करने और संजीव कुमार का नाम छोड़ने के बाद ज्योति कुमारी ने अपने आत्मवक्तव्य में कहा कि उन्हें कहानियां लिखना नहीं आता है, लेकिन उनके पास कहानियां हैं और वे कहानियों को जीती हैं, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वे कहानी कला के सिद्धांत नहीं जानतीं। हिंदी में प्रकाशिकाएं न होने की बात उठाते हुए उन्होंने कहा कि हालांकि अब सारे विवाद शांत हो गए हैं, लेकिन इस किताब के प्रकाशन के चलते वे काफी परेशान हो गई थीं। अपनी रचना-प्रक्रिया, कहानियों और संघर्षों पर देर तक बोलने के बाद जब वे अपनी सीट की तरफ लौट रही थीं, तब राजेंद्र जी ने उनसे कहा कि वे अच्छा लेकिन कुछ ज्यादा ही बोल गईं।

इसके बाद 20 दिन पहले विश्व पुस्तक मेले में हो चुका ‘पुस्तक विमोचन’ एक दफे यहां और हुआ। अब बारी राजेंद्र जी की थी, उन्होंने माइक संभालते और हरिशंकर परसाई की एक कहानी का संदर्भ देते हुए, उसे नामवर सिंह से जोड़ दिया। ‘बड़े घर के बेटे हैं, जब से हुए लेटे हैं' वाले मजाहिया लहजे में उन्होंने ज्योति को बड़े घर की बेटी बताते हुए कहा कि वह ‘छोटी सी बात’ का भी ‘मलीदा’ बना देती है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका आशीर्वाद सदा ज्योति के साथ है और वह आगे इससे बेहतर कहानियां लिखेगी।

‘मैं इसलिए खड़े होकर बोल रहा हूं ताकि जान सकूं कि अब भी खड़े होकर बोल सकता हूं या नहीं’ यह कहा भारतीय आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह ने। नामवर जी ने भी मजाहिया लहजा अपनाते हुए ज्योति को ‘शरीफ’ नहीं ‘हरीफ’ लड़की बताया। ‘उगते हुए पौधे को नापते नहीं बाढ़ रुक जाती है’ यह कहते हुए नामवर जी ने एक बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि वे वाचिक परंपरा के आलोचक हैं और उन्होंने ‘दस्तखत और अन्य कहानियां’ की कोई भूमिका नहीं लिखी है, लेखिका ने पांडुलिपि पर बोली गई उनकी बातों को दर्ज कर लिया था, इन बातों को ही भूमिका के रूप में छापा गया है। यह बताते हुए कि ‘शरीफ लड़की’ की जगह इस किताब का शीर्षक ‘दस्तखत’ रखने की सलाह उन्होंने ही ज्योति को दी थी और इस वजह से ही यह किताब आनी कहीं से थी और आ कहीं से गई। इन कहानियों की भाषा पर नामवर जी ने कहा कि इनमें उर्दू शब्दों की बहुतायत है,  और इस वजह इन कहानियों ने 'हिंदुस्तानी' प्रभाव ग्रहण कर लिया है। उन्होंने आगे कहा कि उन्हें ज्योति की कहानियां उसके संघर्षों को जानने के बाद बड़ी लगती हैं, ज्योति शादीशुदा है और परित्यक्ता भी, यह कहकर मैं किसी के मन में कोई करुणा उपजाना नहीं चाहता, लेकिन ज्योति की ये कहानियां इस अर्थ में वाकई बेजोड़ हैं। अंत में उन्होंने इस पूरी गोष्ठी को समीक्षात्मक कहने के बजाए 'प्रोत्साहन गोष्ठी' कहने पर जोर दिया।

फेडआउट : मज्कूर आलम ने कहा कि अब धर्मेंद्र सुशांत आकर सबका आभार प्रकट करने की परंपरा अदा करें, क्योंकि हम परंपरा को आगे ले जाने में यकीन रखते हैं। बाहर पूरे परिवार सहित पधारे एक आदमी ने मज्कूर आलम से कहा, 'ऐसे प्रोग्राम हुआ करें तो बता दिया करिए महराज...।'




Thursday, February 13, 2014

वैलेंटाइन-डे की पूर्व संध्या पर...


प्रख्यात नारीवादी लेखिका जर्मेन ग्रीयर ने अपनी प्रख्यात पुस्तक The Female Eunch में प्रेम संबंधी अध्याय लिखते हुए इसे आदर्श, परोपकारिता, अहंमन्यता, सम्मोह, रोमांस, पुरुष फंतासी, मध्यवर्गीय मिथक, परिवार और सुरक्षा के नजरिए से देखा है। जर्मेन के तर्क प्रेम से जुड़ी परंपरागतगत मान्यताओं की धज्जियां उड़ा देते हैं। 'रोमांस स्टिल लिव्ज' यह आवाज उठे भी कई दशक गुजर गए और इस दरमियान समय-समाज में कई नई स्वतंत्रताएं चली आईं। ये बातें आज 'वैलेंटाइन-डे की पूर्व संध्या पर' सहज ही याद हो आईं और आज से एक वर्ष पहले पढ़ी युवा पत्रकार  विनायक राजहंस की यहां प्रस्तुत यह व्यंग्य-रचना भी। इसे आप भी पढ़िए और 'रोमांसित' होइए, वैलेंटाइन-डे की शुभकामनाओं सहित… 




यह आकाशवाणी प्रेम नगर है। पेश है देश के राष्ट्रपति का वैलेंटाइन-डे की पूर्व संध्या पर देशवासियों के नाम प्रेम संदेश!

मेरे प्यारे भाइयों-बहनों, प्रेम के पुजारियों! वैलेंटाइन के पावन पर्व की इस संध्या पर मैं आप सभी को इस प्रेमोत्सव की बधाई देता हूं। प्रेम प्रदर्शित करने का यह पर्व यूं तो हमारे देश में पश्चिम से आयातित है, लेकिन चूंकि हमने पश्चिम की तमाम संस्कृतियों को सहर्ष गले लगाया है तो इस 'महासंस्कृति’ को भी शिरोधार्य करते हैं। आगत का स्वागत तो हमारी संस्कृति ही रही है। जो आया, हमने अपना लिया। वैसे भी हमने अपनाया ज्यादा है, खुद कम अपनाए गए हैं। जब-जब ऐसा हुआ है, इतिहास वहीं खड़ा रहा है।

जहां तक प्रेम की बात है तो यह तत्व हमारे यहां कण-कण में है। अणु-अणु में प्रेम केंद्रित है। तन में है, मन में है, धन में तो खैर है ही। हमारे देश में समय-समय पर प्रेमी पैदा होते रहे हैं। मिलते रहे हैं, बिछुड़ते रहे हैं। त्रेता युग के श्रीराम, द्बापर के गिरधारी से लेकर कलयुग के आईजी पांडा और मटुकनाथ तक प्यार का अनवरत सिलसिला जारी है और अनंत काल तक जारी रहेगा।

यह रीतिकाल की उन नायिकाओं का देश है, जो प्रेम में इतनी पगी हुई रहती थीं कि प्रेमी के विरह में उनका शरीर फायर बन जाता। उनकी देह से दिया छुआने पर बाती जल उठती थी। यह वही देश है, जहां के सोहनी-महिवाल ने कच्चे घड़े से नदिया पार की। आज ऐसे ही प्रेमियों की जरूरत है हमारे देश को। घरों में संझा बाती के लिए महिलाओं को माचिस ढूंढ़ने की जरूरत तो नहीं पड़ेगी! कहीं भी होंगी, आग लग जाएगी! वहीं अस्तित्व के संकट को लेकर रो रहे घड़े के दिन भी बहुर जाएंगे। शीरी-फरहाद हमारे देश के नहीं हैं, लेकिन यहां भी उनके अवतार की कमी नहीं है। इन्होंने आंसू तो खूब बहाए, जब सूख गए तो दूध की नदियां बहा दीं। आज ऐसे ही फरहाद ही जरूरत है, ताकि देश में दूध की कमी न हो। और भी तमाम प्रेमी हुए हैं, जो आज के दौर के लिए प्रासंगिक हैं। भारत देश की इस धरती में लविंग सल्फेट नामक खाद प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है, तभी तो वीर, प्रतापी, महाबली प्रेमी हमारे हिस्से आए हैं।

एक बार मैं एक स्कूल में गया। वहां दसवीं कक्षा के एक स्टूडेंट टाइप बच्चे से पूछा, 'बेटा गणतंत्र दिवस कब मनाया जाता है? उसके चेहरे पर प्लस-माइनस के संचारी भाव एक साथ प्रकट हुए, फिर जीरो-सा मुंह लेकर बोला- सर! वैलेंटाइन-डे के पहले। और वैलेंटाइन-डे कब आता है? उसने तपाक से उत्तर दिया- 14 फरवरी को।' मुझे उस बच्चे की प्रखर बुद्धि पर हैरत हुई। तसल्ली भी कि चलो काम की बातें तो उसे पता हैं। मैं आश्वस्त हो गया कि बहुत तरक्की करेगा हमारा देश।

इस समय वासंती बयार के साथ-साथ चुनाव की बयार भी चल रही है। मौसम भी होलियाना है। ऐसे माहौल में हमारे राजनेताओं का प्रेम बॉयलिंग प्वाइंट पर पहुंच जाता है। जनता से उनका प्रेम देखते ही बनता है। कभी वे मतदाता को गले लगाते हैं, कभी उनको अपना जाने कब का याराना याद दिलाते हैं। कभी श्मशान तक पहुंच जाते हैं। कहते हैं, हमें आपसे प्रेम है। आपका प्रेम ही हमें यहां तक खींच लाया है। आप अपना प्रेम बनाए रखिए मतदान तक, उसके बाद हमारा प्रेम देखिए। और वास्तव में चुनाव जीतने के बाद उनका धन-प्रेम हमें खूब दिखता है। वह अपनी फितरत से मजबूर हो जाते हैं।

मनुष्य की और भी तमाम फितरतें होती हैं। मसलन मनुष्य विवाहशील प्राणी होता है। अपनी इस प्रवृत्ति के चलते वह कई बार दुर्घटनाग्रस्त होता है, लेकिन फिर मोर्चे पर डट जाता है। जान-माल का जोखिम इसमें बहुत है। इसलिए इस प्रवृत्ति से बचें। ऐसा कुछ भी न करें, जिससे बात इस भयानक स्थिति तक पहुंच जाए।
जिनका पहला-पहला वैलेंटाइन है, वे अत्यधिक सावधानी बरतें अन्यथा वह आखिरी हो सकता है। जो पहले की तलाश में हैं, वे फर्स्ट-एड बॉक्स लेकर निकलें। क्या पता कब जरूरत पड़ जाए।
आखिर में मैं यही कहना चाहूंगा कि प्रेम मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस अधिकार का प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। सो खूब प्यार करें, इजहार करें। लेकिन खयाल रखें, यह जो प्रेम का बहाव है, इसमें जानकारी ही बचाव है। इसलिए निगहबान रहें, सावधान रहें, लैश रहें!
मोहब्बत जिंदाबाद!

Friday, January 31, 2014

सूक्तियों और कटूक्तियों का वटवृक्ष




कवि  कृष्ण कल्पित की इन दिनों चर्चित काव्य-कृति 'बाग-ए-बेदिल' की  ओम निश्‍चल लिखित यह समीक्षा भी प्रकाशित होते ही इन दिनों चर्चित हो गई है। एक पृथुल काया वाली कृति की महज 900 शब्दों की यह समीक्षा कृति और कृतिकार के साथ कितना न्याय कर पाई, यह प्रश्न विचारणीय है और यह प्रश्न भी कि कृतिकार के लिए समीक्षा कितनी अनिवार्य है और आस्वादक के लिए वह खुद क्या है, रचना या सूचना… 







कृष्‍ण कल्‍पित साहित्‍य और मीडिया के अंत:पुर के निवासी हैं, मीडिया, सिनेमा और साहित्‍य के मर्म को जानने-समझने वाले हैं पर वे साहित्‍य में केवल इसलिए नहीं जाने जाते कि वे क्‍या लिखते हैं, क्‍यों लिखते हैं बल्‍कि इसलिए भी कि वे अपने दोस्‍तों-दुश्‍मनों के लिए क्‍या लिखते हैं। एक दौर था पॉकेट संस्करण में छपी शराबी की सूक्‍तियां देखकर लगा था कि ये सूक्‍तियों में कटूक्‍तियां कहने से हिचकने वाला इंसान नहीं है। कविता चाहे उन सूक्‍तियों में क्षीण रही हो, पर जमाने की चाल पर लानत भेजने की प्रवृत्ति उसमें अवश्‍य झलकती थी। साहित्‍य में उसकी कितनी चर्चा हुई, नहीं हुई यह दीगर बात है पर कल्‍पित के भीतर के कवि की उलझनों का बयान वह जरूर करती थी। ‘एक शराबी की सूक्‍तियां’ को बीज वक्‍तव्‍य मानें तो 'बाग-ए-बेदिल' ऐसी सूक्‍तियों-कटूक्तियों का वटवृक्ष है।

इधर अर्से से मोबाइल पर फेसबुक पर सार्त्र, पार्थ, कबीर, रैदास, मीर, गालिब आदि इत्‍यादि के संदर्भों संबोधनों के साथ लगातार कुछ न कुछ लिखकर वे दोस्‍तों को भेजते रहते थे। इनमें कभी कविता होती, कभी कटाक्ष। कभी अपनी आवाजाहियों की खबर होती कभी खबर लेने वालों की खबर। कभी उनके भीतर बात बात पर बिदक जाने वाले ऐसे जीव के दर्शन भी होते जिसे यह दुनिया सिरे से बेगानी लगती। कुछ लोग उनकी सदैव हिट लिस्‍ट में रहे आए। जैसे अज्ञेय, अशोक वाजपेयी, ओम थानवी या अन्‍य कलावादी। जिससे भी वे रूठ जाएं उसकी ऐसी तैसी निश्‍चित है। पर यह उस आशुकवित्‍व की परंपरा से अलग है जब समस्‍यापूर्तियों के दौर में एक कवि सम्‍मेलन में हितैषी के एक कविता-कटाक्ष से आहत होकर आशुकवि गयाप्रसाद शुक्‍ल सनेही ने वहीं पर एक कवित्त ‘ऐसे हितैषी की ऐसी की तैसी’ सुना कर उनसे अपना हिसाब किताब बराबर कर लिया था। एक कवि-प्रतिभा व्यवस्‍था और सत्ता से तो बैर रखती है पर साहित्‍य और कला की ही दुनिया के कुछ जाने-पहचाने चेहरों से उनकी ऐसी अदावत दिखती है कि उनकी चर्चा भर चलने से कल्‍पित के भीतर हलचल-सी मच जाती है। ऐसे कई सबूतों से 'बाग-ए-बेदिल' भरी है। कभी कभी सोचता हूं कि ऐसे चलते-फिरते किरदार न होते तो कल्‍पित की कविता कितनी बेजान होती!

लेकिन जिन-जिन लेखकों कवियों को उन्‍होंने 'बाग-ए-बेदिल' का प्रेरणास्रोत माना है और कई जगहों पर उनका आभार ज्ञापन भी किया है, देखकर हैरत होती है कि ऐसी व्‍यक्‍तिवादी विद्वेषवादी इबारतों से कविता का भला क्‍या रिश्‍ता ? पर ये तो कल्‍पित ही जानें या इसकी प्रेरणा देने वाले। इसीलिए शायद उनके यहां कुछ सीप-शंखों का जखीरा है तो कुछ घोंघे और कंकड़-पत्‍थर भी। लिहाजा 'बाग-ए-बेदिल' की पृथुल काया में जहां कृष्‍ण कल्‍पित के कवित्‍व का प्रमाण देने वाली कुछ बेहतरीन गजलें हैं, पद हैं, रुबाइयां हैं, साहित्‍यिक कटाक्ष हैं, वहीं निजी हिसाब-किताब चुकता करने और कविता का शीलभंग करने वाली पदावलियां भी हैं जो कविता की दुनिया में अन्‍यत्र देखने को नहीं मिलतीं।



पुस्‍तक में दर्ज लंबी भूमिका को उन्‍होंने 'आवारगी का काव्‍यशास्‍त्र' कहा है। शायद उनके ध्‍यान में ‘सलीका चाहिए आवारगी में’ जैसी पद रचना रही हो। आवारगी की इस शास्‍त्र चर्चा में वे बुद्ध के गृह त्‍याग एवं राहुल सांकृत्‍यायन की घुमक्‍कड़ी की चर्चा करते हैं और पूछते हैं कि क्‍या बिना किसी धुआंधार आवारगी के निराला ने आनंद भवन की ऐय्याश अट्टालिकाओं पर गुरु हथौड़ा प्रहार किया था। सारांश यह कि आवारगी जैसे विचारों के रचनात्‍मक आविर्भाव के लिए कोई अपरिहार्य तत्‍व  हो। कल्पित ने अध्‍ययन को भी आवारगी की संज्ञा से ही अभिहित किया है। उनका वश चले तो 'बाग-ए-बेदिल' को शैतानी आयतों की तरह शैतानी श्‍लोक कहें। वे भले ही कहें कि यह आत्‍मरक्षार्थ रचित है, किसी दुश्‍मन, किसी भू-खंड या कीर्ति को विजित करने के लिए नहीं, किंतु खेल-खेल में लिखी गई आवारगी की इन कविताओं में ’खेलन मैं को काको गोसैंयां’ का भाव ही प्रबल है। वे प्रहार करते हैं और प्रहार का सुख भी लेते हैं । उनके शब्‍दों में यह गद्य गजल है या फिर कोई असमाप्‍त कविता। पर अंतत: वे इस स्‍वाभिमान से भरे जरूर हैं कि एक बढ़ई के बेटे का दुनिया कुछ नहीं बिगाड़ सकती। कभी-कभी उनकी गजलों के कुछ अशआर हमारी चेतना में दबे पांव जगह बना लेते हैं जो धोखादेह तरीके से हमें उनका आशिक भी बना देते हैं। मिसाल के तौर पर : 

शायरी है नहीं गदादारी
ये हुनर मांगकर नहीं मिलता
खुद ही मरना है, खुद ही रोना है
आजकल नौहागर नहीं मिलता

कभी किसी साहित्‍यकार ने कहा था कि आगे चलकर कविता-कर्म और कठिन होता जाएगा। आज यह सहज संभाव्‍य हो गया-सा लगता है। कल्पित की यह शाइरी ऊपर से बेशक खंड-खंड पाखंड पर्व का उपहास करती दिखती हो, पर भीतर से इस शायरी की आत्‍मा भी खंडित लगती है। सुपरिचित कवि अरुण कमल ने बाग-ए-बेदिल की दिल खोलकर तारीफ की है तथा इसे एक बीहड़, सघन वन-प्रांतर के रूप में देखा है, किंतु इस दीवान को देखकर लगता है, एक बड़ी संभावना वाला कवि इस दीवान की पृथुल काया में कहीं दबकर रह गया है। वह दु:ख की लहर से कम, ईर्ष्‍या और निजी खुन्‍नस से ज्‍यादा परिचालित है, जिसने इस दीवान को एक 'शिकायतनामे' में बदल दिया है। इसके बावजूद 'बाग-ए-बेदिल' कुछ अच्‍छी गजलों, नज्‍मों, रुबाइयों, चौपदों और चम्‍पू किस्‍म की रचनाओं के लिए याद किया जाएगा, यद्यपि आलोचना में इसकी जगह कहॉं मुकर्रर होगी, कह सकना कठिन है। 

शुक्रिया 'शुक्रवार'। वहीं से साभार।

Tuesday, December 17, 2013

एक लंबी कहानी और विस्थापन पर कुछ दर्ज करने की इच्छा...

...विस्थापन को समझने के लिए अब बहुत दूर जाना नहीं पड़ता है बहुत दूर तो बहुत देर हुई हम चले आए। अब बस रहे आना है। इन आरंभिक पंक्तियों के बीच में कहीं ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ शब्द आना चाहिए, लेकिन हम सचमुच इतनी दूर चले आए हैं कि हमारे दुर्भाग्य की शुरुआत कहां से हुई— अब यह स्पष्ट नहीं है। घर से कार्यालय तक जाना भी एक विस्थापन लगता है। ‘रेजिडेंस ऑन अर्थ’ (पाब्लो नेरूदा) और ‘आउट ऑफ प्लेस’ (एडवर्ड सईद) पढ़ चुकने के बाद भी इस तथ्य से मुक्त नहीं हुआ जा सकता कि विस्थापन अब एक दैनिक दुःख है और अगर रघुवीर सहाय की एक काव्य-पंक्ति का आश्रय लेकर कहें तब कह सकते हैं कि इस दुःख को रोज समझना पड़ता है। मेरे सुदूर की स्थिति यह है कि वह स्थिर रहा और विस्थापित हो गया, मैं गतिवान रहा और...

‘यह तथाकथित अज्ञानपूर्ण अंधेरे युगों की ओर लौटने का प्रयास नहीं है बल्कि यह स्वैच्छिक सरलता, निर्धनता और धीमेपन में सुंदरता देखने का प्रयास है। मैंने इसे अपने आदर्श के रूप में देखा है। मैं खुद इस तक कभी नहीं पहुंच पाऊंगा और इसलिए देश से ऐसी कोई उम्मीद नहीं कर सकता, लेकिन विविधता की हवा में उड़ने, जरूरतों की अनेकता की आधुनिक बदहवास दौड़ में शामिल होने का मुझे कोई आकर्षण नहीं है। वे हमारे अंतस को मार देते हैं। जिस चकराने वाली ऊंचाइयों को पाने का प्रयास मनुष्य की प्रतिभा कर रही है, वह हमें हमारे उस विधाता से दूर ले जाएगी जो चमड़ी को ढंकने वाले नाखून से भी अधिक हमारे करीब है...’
[ ‘हिंद स्वराज’ को समझने की कुंजी बताते हुए मोहनदास करमचंद गांधी ]

रघु राय 

‘तद्भव’ के 28वें अंक में प्रकाशित युवा कहानीकार शिवेंद्र की लंबी कहानी ‘चांदी चोंच मढ़ाएब ए कागा उर्फ चाकलेट फ्रेंड्स’ को पढ़ते हुए बहुत स्वाभाविक रूप से ‘हिंद स्वराज’ की याद आती है। कहानी की एक पात्र कलकतिया चाची को नहीं मालूम बाहर की दुनिया कैसी है— ‘अठवा जइसे भईस की देह में पड़े रहते हैं वैसे ही हम लोग जी रही हैं... बाहरी दुनिया की बस एक पापिन को हम जानती हैं— बैरन रेल को। वह हमारे गांव में बस एक पल को रुकती है और हमारा संसार समेटकर न जाने कहां उगल आती है...।’ रेल की ‘धड़क... धड़... धड़...’ इस कहानी का संगीत है और ‘लोक’ इसका गीत—

‘मोरा रे अंगनमा चनन केर गछिया,
ताहि चढ़ी कुररय काग रे
सोने चोंच मढ़ाय देब बायस
जआं पिया आओत आज रे!’

विद्यापति की इन पंक्तियों से शुरू होने वाली यह लंबी कहानी एक अद्भुत विस्थापन-वृत्तांत है। इसे पढ़कर ऐसा लगता है जैसे संसार की बहुत सारी कहानियों ने इस एक कहानी को संभव किया है। सब कहानियां इस तरह संभव नहीं होतीं। वे अपनी प्रगति के लिए दूर तक नहीं जातीं, जैसे उनके पूर्वज गए थे—

‘पियवा गइलन कलकतवा ए सजनी,
तूरी दिहलन पति-पत्नी-नतवा ए सजनी!
किरिन भीतरे परतवा ए सजनी,
गोड़वा में जूता नइखे, सिरवा पर छतवा ए सजनी!
कइसे चलिहन रहतवा ए सजनी,
सोचत-सोचत बीतत बाटे दिन-रतवा ए सजनी!
कतहूं लागत नइखे पतवा ए सजनी,
लिखत ‘भिखारी’ खोजिकर बही-खतवा ए सजनी!’
 [ भिखारी ठाकुर कृत ‘बिदेसिया’ ]    

हमें चले गए पूर्वजों को खोजना होता है, उनके पद-चिन्हों पर चलते हुए— विस्मृति से बचते हुए। शिवेंद्र का कहानीकार बहुत अध्यवसाय से यह कार्य करता है क्योंकि वह जानता है कि लौटने से बढ़कर और कोई जादू नहीं। और यह भी कि जितने भी वादे थे सब लौटती बेर के थे और उमर खत्म हो रही थी और किसी का भी लौटना हो नहीं रहा था।

यह कहानी हिंदी में एक ऐसे वक्त में नुमायां हुई है, जब कहानियां हमें फरेब दे रही हैं और संसार में कहानियों का वक्त गुजर चुका है, बावजूद इसके कि गई हाल में ही एलिस मुनरो को साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया। यह कहानी बताती है कि सच्चाइयां सबसे लंबे दिनों तक सिर्फ कहानियों में ही जीवित रह सकती हैं। इस कहानी का मुख्य पात्र एक जादूगर है जो जन्म से विस्थापन की त्रासदी झेलने के लिए अभिशप्त है। वह एक ऐसे गांव में पैदा हुआ है जहां के लगभग सारे मर्द कमाने के लिए बाहर गए हुए हैं और लौट नहीं रहे हैं। गांव में एक इंतजारघर है, जहां आकर गांव की सारी स्त्रियां सामूहिक प्रतीक्षा और विलाप करती हैं। इससे ज्यादा इस कहानी को उद्घाटित करना इस कहानी के साथ अन्याय होगा...।

‘अद्भुत’ एक रूढ़ शब्द है और इस कहानी के संदर्भ में अपर्याप्त भी, लेकिन फिर भी इस कहानी के जिक्र में वह यहां आया है। किसी रचना के तात्कालिक प्रभाव से मुक्त होने के लिए, जब उसका आस्वाद शेअर किया जाता है तब संबंधित रचना के संदर्भ में ‘अद्भुत’ एक समीचीन शब्द होता है। इस प्रभाव या कहें दबाव से मुक्त होने के बाद जब मैं शिवेंद्र की कहानी के बारे में पुन: सोचता हूं तो पाता हूं कि असल जादू वहां नहीं है जहां हम अपनी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं के लिए विस्थापित हो जाते हैं, बल्कि वहां है जहां से हम विस्थापित होते हैं। हमारे अभाव, विवशताएं और नादानियां हमें हमारे आस-पास घटता हुआ जादू अनुभव नहीं करने देते और यह दुनिया एक इंतजारघर बन जाती है। इसे विस्थापन और विलाप से राहत देने के लिए चाकलेट की जरूरत पड़ती है। चाकलेट और कुछ नहीं— प्रेम, बंधुत्व, सहअस्तित्व और उम्मीद का एक रूपक है। अलका सरावगी के उपन्यास ‘कलि-कथा वाया बाइपास’ में हैमिल्टन साहब को समझाते हुए रामविलास कहता है— ‘देखिए साहब हमें दुःख भी उन्हीं बातों से होता है जिनसे हमें कभी सुख मिला था। अभाव उन्हीं चीजों का महसूस होता है जिनके प्रति कोई भाव रहा था। आदमी छटपटाता है इन विपरीतों के अंतिम सिरों से मुक्त होने के लिए...।’

शिवेंद्र की कहानी कहती है— ‘सदियों से यही होता आया है कि कहानियां, नदियां और लोग अलग-अलग कारणों से अपनी पैदाइश छोड़कर आगे बढ़ते रहे हैं। यह आगे बढ़ना कभी-कभी उड़ने की आकांक्षा और ऊब की अकुलाहट से संभव होता है, लेकिन अक्सर यह जन्मता है उजड़ने की मजबूरी से...।’

विस्थापन के विषय में ऊपर उद्धृत वाक्यों के बाद इसी कहानी से अंत में कुछ और पंक्तियां भी:

‘जब गांव छूटता है, सबसे पहले नदी याद आती है।’

‘घर मां के बाद दुनिया का सबसे प्यारा शब्द है और मां सभी प्यारे शब्दों की दुनिया है।’

‘जब भी जलना चुप रहना... जो आज जल रहा है वह कल बुझ जाएगा।’

‘मरते हुए आदमी का वक्त उसकी हथेली पर होता है और वह किसी भी वक्त में आ जा सकता है।’

‘चांद पर जाने का कोई वक्त नहीं होता, बस आपके साथ कोई जाने वाला होना चाहिए।’

‘एक समय के बाद हर कोई बूढ़ा हो जाता है।’

‘सभी मांएं झूठ गढ़ती हैं।’

‘मनुष्य की अमरता है कि वह अपनी संतान में स्वयं को बचा लेता है।’

‘जब कोई अन्यमनस्क होता है, दरअसल स्मृतियों में होता है।’

‘रो लेने से भीतर का इंतजार शांत हो जाता है— कुछ देर के लिए ही सही।’

Friday, October 18, 2013

व्यक्त वाक्य और एक अनौसत फिल्म

Leonardo DeCaprio और Ben Kingsley के औसत अभिनय और Martin Scorsese के औसत निर्देशन वाली  Shutter Island एक औसत फिल्म ही है, लेकिन बावजूद इसके यह कुछ विशेष वाक्य रचती है-- दरिंदगी, विक्षिप्तता, विरोध, भय और हिंसा के विषय में और इस तरह यह फिल्म कुछ वाक्यों के माध्यम से अपने औसतपन से एक हद तक मुक्त होती है। प्रस्तुत है इस फिल्म से ऐसे ही कुछ वाक्य....




जब तुम किसी दरिंदे को देखते हो तब तुम्हें उसे रोकना ही चाहिए
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कुछ हद तक विरोध है बचने की भावना
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दरिंदगी है होश में न रहना
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घाव दरिंदगी को जन्म दे सकते है
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सबसे बदतर क्या होता है एक दरिंदे की तरह जीना या एक भले आदमी की तरह मर जाना
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परमेश्वर ने हमें हिंसा दी ताकि हम उसे बरते उसके प्रति आदर स्वरूप
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लोग कहते हैं कि आप पागल है और इस पर आपका विरोध यह साबित करता है कि वे जो कह रहे है वह सच है
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बहुमूल्य बातें ही गलत समझी जाती हैं

Friday, October 11, 2013

लोनली बैचलर की डायरी...






रवि जोशी युवा पत्रकार हैं। मुंबइया सिनेमा पर 'दि संडे पोस्ट' में हर हफ्ते लिखते रहे हैं।  कुछ अखबारों में काम करने के बाद गए एक वर्ष से उत्तराखंड से संबंधित एक वेब साइट के निर्माण में प्रमुख सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं। फिलहाल इस सबसे और दिल्ली से ऊबकर पहाड़ पर चले गए हैं। यह बेहतर है कि यह जाना संन्यास या वैराग्य या ध्यान या आत्म-स्थित होने के लिए नहीं है। यह जन और जीवन को बेहतर ढंग से समझने और इस ओर एकाग्र होने के लिए है। प्रस्तुत डायरी अंशों में ऐसी आहटों के साथ-साथ एक युवा-मन भी है और पीछे रह गईं स्थानीयताओं से मोह-भंग सी स्थिति भी। फिर भी यह स्मृति को प्राप्त हो गए मन का रोजनामचा है जो यह प्रकट करता है कि आगे जीवन है...   





...आज रात 10 बजे गाजियाबाद के एक बड़े मॉल से फिल्‍म देखकर निकला। एक अजीब सी उलझन होने लगी। लगा कुछ छूट रहा है। बहुत तेजी से वापस हो जाने को दिल करने लगा, शायद पिछले दो महीनों में उस छोटे से गांव के अंधेरे की आदत हो गई है मुझे, इसलिए सिनेमाघर के अंधेरे से निकलकर बहुत तेज चमकती हुई स्‍ट्रीट लाइट ने अन्‍कफर्टेबल कर दिया। इस बार दिल्‍ली से अपना सब कुछ लेकर जाने के लिए यहां आया हूं, अब मेरे लिए दिल्‍ली या तो एक रास्‍ता बन जाएगी या बाजार, शायद यहीं इस शहर की फितरत है। यह शहर या तो किसी के लिए बाजार है या फिर रास्‍ता। आदमी यहां सिर्फ मतलब से आता है, यहां सिर्फ मतलब से रहता है और मतलब से ही जीता है। यहां कोई कुछ भी बेमतलब करने की हिमाकत नहीं करता। मैं समझदार नहीं हूं फिर भी इस शहर को अपनी आंखों से देखने की जरूरत की है। इसके उलट वह गांव और वहां की बेमतलब(?) जिंदगी मुझे अपनी तरफ ज्‍यादा खींचती है। आज ही एहसास हुआ कि दिल्‍ली की चमक-धमक और तमाम रौनक के बाद भी यह शहर मुझसे वह रिश्‍ता नहीं बना पाया जो छोटे से पंत गांव ने कुछ ही दिनों में बना लिया। अंधेरा भी कितना खूबसूरत हो सकता है, यह भी आज ही पता चला। इस शहर में तो वैसा अंधेरा देखने के लिए आप तरस जाएंगे, ऐसा अंधेरा कि आप अपनी हथेली को भी न देख पाएं। शायद कई लोग मेरी इस बात से इत्तफाक न रखें, तो मैं कहूंगा कि ये लोग शायद लोगों के दिलों को देखने का हुनर जानते हैं। यहां वैसा अंधेरा लोगों के दिलों में है, और उनके चेहरों पर यह बात इबारत की तरह गुदी हुई दिखाई पड़ती है। भागते हुए लोग परेशान है, मेट्रो पहले की तरह ही बोझा उतारती और चढ़ाती अपने विश्राम स्‍थल में पहुंच जाती है। रात होती है लेकिन अंधेरा नहीं होता, दिन होता है चमकदार रोशनी भी होती है, लेकिन यहां एक दिन में दिखने वाले हजारों हजार चेहरों में से किसी एक में भी वह चमक नहीं दिखती, चेहरे की मुस्‍कुराहट आज मोडिफाइड स्‍माइल बन गई है। माफ कीजिएगा मैं यह सलाह देने की हिमाकत कर रहा हूं कि एक बार गांव जरूर देखिए, गंवार लोगों में और समझदार लोगों से दूर बसी उस पिछड़ी दुनिया में अब भी सच्‍चाई और सुकून यहां की तुलना में बहुत ज्‍यादा है।

मेरा दिल अब यहां नहीं लग रहा, क्षमा...

इस शहर में यह मेरी आखिरी रात है, कल इस समय मैं इसकी सरहद को पार कर दूसरे प्रदेश में प्रवेश कर जाऊंगा।
***
दिन की शुरूआत कपड़े धोने से हुई। दो दिन डायरी लिख नहीं पाया। पहले दिन सफर में था और दूसरे दिन थकान ज्‍यादा थी शायद। दिल्‍ली से लौटकर इस गांव में बहुत अच्‍छा लग रहा है। जिस दिन लौटा उस दिन एक बैचलर के जीवन में खिचड़ी और अंडों का महत्‍व समझ आया। दिन में फटाफट खिचड़ी बनाई और रात को आमलेट और रोटी। आलसियों और थके-हारे कुंवारों के लिए ये देसी चीजें कहीं न कहीं पौष्टिकता के आधार पर मैगी को टक्‍कर देती हैं। मैगी हिट है क्‍योंकि खिचड़ी और आमलेट-रोटी का प्रचार-प्रसार नहीं हुआ है और इसके दो मिनट में बन जाने के दावे को किसी टी.वी. चैनल में नहीं दिखाया गया।

आज दिमाग में थोड़ी से खींचतान थी। कल से सुबह जल्‍दी उठने का प्रयत्‍न करुंगा और सुबह टहलने जाउंगा। उम्‍मीद है कि इतना कर सकूंगा। 
***
बिच्‍छू घांस ने आज पहली बार छुआ और जहां-जहां छुआ तेज सुरसुरी हुई और इस अनुभव को झेल चुके कहते हैं कि यह करंट लगने जैसा एहसास 24 घंटों तक रहेगा। आज पहली बार ही मैंने दही जमाने की कोशिश भी की है, नतीजा कल पता चलेगा। मैं एक्‍साइटेड हूं। आज ऐसी तरोई की सब्‍जी खाई जिसे सिर्फ वही खा सकता था जिसने उसे बनाया हो। बेशक अगर 'शोले' में गब्‍बर की मां होती तो वह भी अपने बेटे को उतना ही प्‍यार करती जितना राखी ने 'करन-अर्जुन' को किया। बस यही सोच मैंने अपनी बनाई हुई तरोई की सब्‍जी खा ली। 
और कुछ नहीं बस कई तरह की तकलीफों के साथ सोने का समय हो गया है।
***
एक दिन में 180 किलोमीटर गाड़ी चलाना, लोगों से मिलना और समझना-समझाना। अब तो न खाना बनाने की हिम्‍मत रह गई है और न खाना खाने की...
दिन शुरू भी जूली (मेरी मोटर साइकिल) के साथ हुआ था और खत्म भी उसी के साथ हुआ। पहली बार जूली को अल्‍मोड़ा की सड़कों में घुमाकर लाया। वह खुश है, लेकिन मैं थक गया हूं...
बाकी सब वैसा ही चल रहा है। एक अच्‍छी बात यह हुई कि हल्‍की सी डांट पड़ी और ऐसी उम्‍मीद जगी कि उत्तराखंड फाइटर्स का काम फिर से शुरू होगा। मेरा थोड़ा काम बेशक बढ़ेगा लेकिन मैं उसको लेकर अभी से उत्‍साहित हूं। पूरा एक साल मैंने उस वेबसाइट पर पूरी जान लगाकर काम किया है।
***
याद है वह खिड़की 

अब उसे बंद रखने का समय भी आ गया है। 

यहां सुबह और शाम ठंडी हवाओं के चलने का सिलसिला शुरू हो गया है।

लोग बताते हैं यहां ठंड बहुत होती है, अलाव भी जलाना पड़ता है। 
रजाई में बैठे रह जाना पड़ता है। 
कुछ करो या न करो पर ठिठुरना पड़ता है। 
मोटे कपड़ों में खुद को छुपाना पड़ता है। 

बहरहाल मैं अब खुश हूं...

इन सर्दियों में पहली बार आसमान में रूई की तरह गिरती हुई बरफ देखूंगा

और उस दिन हाथ में गरम कॉफी के साथ खिड़की को फिर से खोलूंगा...
मेरी खिड़की भी बहुत दिनों बाद शायद खुश होगी...
तुम्‍हारे बिना भी। 
***
मैं हिंदी ही लिखता हूं, अंग्रेजी लिखने और पढ़ने के लिए भी हिंदी में ही सोचता हूं, किसी को आदर देना होता है तो हिंदी में बात करता हूं, किसी पर प्‍यार आता है तो हिंदी में ही प्‍यार जताता हूं... बहुत ज्‍यादा तो नहीं लेकिन हिंदी से ही शुरू होता हूं और हिंदी पर ही खत्‍म होता हूं...
प्‍यार, गुस्‍सा, नफरत और ज्ञान सभी की भाषा हिंदी ही है...
***
पहाड़, अंधेरा, बाइक राइडिंग, ठंडी हवा और जंगली जानवरों का डर... एक साथ इतना बेहतरीन होगा आज महसूस किया, पहली बार यहां रात 10 बजे बाइक चलाई...

यहां खरगोश बहुत दूर तक आपकी गाड़ी के आगे रौशनी के साथ भागते हैं-- ऐसा लगता है वे आपको घर तक साथ छोड़ने के मूड में हैं... यहां आकर जाना है प्रकृति को जितनी पास से देखेंगे उतनी ही दुनिया अपनी दिखेगी... यहां तो पेड़-पौधे और जानवर सब मुझसे बात करते हैं...
***
आज अंधेरे में घूमने का मन हुआ। लाइट आ रही थी, जा रही थी... मैं भी निकल पड़ा। यहां के लोग अंधेरे में सड़क पर जाने के लिए मना करते हैं। क्‍योंकि यहां जंगली जानवरों का खतरा ज्‍यादा होता है, लेकिन फिर भी आज मैं इस चंचल मन को नहीं रोक पाया। अंधेरे से खचाखच भरी सड़क पर चलना ऐसा लगता है जैसे मैं मुंह के बल किसी अंधेरी नदी में डूबता जा रहा हूं। अंधेरे की इस नदी में डूबना मुझे बहुत अच्‍छा लगता है।
अब नींद आ गई, मैं सो रहा हूं।